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Swaminathan : Ek Jeewani (Raza Pustak Mala)

Swaminathan : Ek Jeewani (Raza Pustak Mala)

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  • Pages: 175
  • Year: 2019, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789388753128
  •  
    अप्रतिम व्यक्ति और चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन को यह दुनिया छोड़े हुए कोई पच्चीस वर्ष होने को आये, पर, दुनिया ने उनको नहीं छोड़ा है। छोड़ेगी भी नहीं। उनका व्यक्तित्व और कामकाज है ही ऐसा कि जब-जब भारतीय कला की बात होगी, बीसवीं शती की कला की विशेष रूप से, वे याद किये जायेंगे। स्वामीनाथन ने बड़ी गम्भीरता से, साहस से, कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ी है, इस बात की कि कला-रचना के साथ-साथ, कला-चिन्तन, कला-विमर्श, बेहद महत्त्व के हैं, कि बिना प्रश्नांकनों, विचारों, और बहसों के हम वह रचनात्मक वातावरण बना ही नहीं पायेंगे, जिसमें 'रचना' मात्र के प्रति उत्तेजना हो, अनुसन्धानी भाव हो, और हो वह दृष्टि जो बहुत कुछ को सम्यक् ढंग से परख सकती हो। एक कलाकार और कला चिन्तक तथा अत्यन्त जि़न्दादिल, सरस, व्यंग्य-विनोदी, हँसी-ठठ्ठा करने वाले, सबके बीच जाने वाले, सबके साथ रहने वाले, सबका साथ चाहने वाले व्यक्ति की जीवनी लिखने में, स्वामी के इन दोनों रूपों को साधने में, एक बड़ी चुनौती पेश आनी ही थी—क्योंकि दोनों एक-दूसरे में गुँथे हुए भी तो हैं। और उन्हें आसपास रखना ही था—दोनों रूपों को। तो, यथासमय, यथा स्थान, उनके इन दोनों रूपों को विन्यस्त किया गया है। और उनके जीवन के ज़रूरी तथ्यों के साथ, उनके विचारों के फलित-प्रतिफलित होने की कथा भी कही गयी है। यह स्वामी की पहली जीवनी तो है ही, उन पर आने वाली पहली पुस्तक भी है। जीवनी को किसी क्रमागत रूप में नहीं लिखा गया—वैसा करना असम्भव भी था, स्वामी के अपने व्यक्तित्व और अपनी ही जीवन शैली के कारण—वे शायद उस रूप में जीवनी का लिखा जाना पसन्द भी न करते। सो, एक 'औपन्यासिक' ढंग से, कथा कहने वाले अन्दाज़ में, उनके जीवन की बहुत-सी बातें कभी सीधे, कभी 'फ़्लैश बैक' में, कभी जो जहाँ उचित लगे जगह बना ले, वाली शैली में दर्ज हुई हैं। उम्मीद है, जीवनी सुधी पाठकों को रुचिकर लगेगी, और उपयोगी भी। —प्रस्तावना से ''जगदीश स्वामीनाथन मूलत: तमिलभाषी होते हुए भी उत्तर भारत में पले-बसे एक मूर्धन्य भारतीय चित्रकार थे जिन्होंने चित्र बनाये, हिन्दी में कविताएँ लिखीं, अँग्रेज़ी में कलालोचना लिखी। वे अपने समय के लगभग सबसे प्रश्नवाची कला-चिन्तक थे जिन्होंने कला के बारे में मूल प्रश्न उठाये और सामयिक प्रश्न भी। भारत भवन में उन्होंने 'रूपंकर' कला-संग्रहालय की स्थापना और संचालन किया और समकालीनता को रेडिकल ढंग से पुनर्भाषित किया जिसमें सिर्फ़ शहराती ही समकालीन नहीं थे बल्कि लोक और आदिवासी कलाकार भी उतने ही समकालीन ठहराये गये। स्वामीनाथन का जीवन और कला एक-दूसरे से इस क़दर मिले-जुले थे कि एक को दूसरे के बिना समझा नहीं जा सकता। कवि-कलाप्रेमी प्रयाग शुक्ल ने रज़ा फ़ाउण्डेशन के एक विशेष प्रोजेक्ट के अन्तर्गत यह जीवनी लिखी है जिसे प्रस्तुत करते हुए हमें प्रसन्नता है।" —अशोक वाजपेयी

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    Prayag Shukla

    प्रयाग शुक्ल

    जन्म २८ मई, १९४०, कोलकाता। कवि, कथाकार, कला समीक्षक, निबन्धकार, अनुवादक और सांस्कृतिक विषयों के टिप्पणीकार। 'कल्पना', 'दिनमान', 'नवभारत टाइम्स' के सम्पादक मण्डल में रहे। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका 'रंगप्रसंग' और संगीत नाटक अकादेमी की पत्रिका 'संगना' के प्रथम सम्पादक। ललितकला की पत्रिका 'समकालीन कला' के प्रथम दो अंकों का भी सम्पादन। 'यह जो हरा है' समेत दस कविता-संग्रह, पाँच कहानी-संग्रह, छह यात्रा वृत्तान्त, और 'गठरी' समेत तीन उपन्यास प्रकाशित हैं। कला, रंगमंच, और फ़िल्म माध्यमों पर बहुतेरा लेखन। कई प्रदर्शनियाँ क्यूरेट की है जिनमें ड्रॉइंग ९४, ड्रॉइंग २०१४, रामकुमार के रेखांकनों की प्रदर्शनियाँ शामिल हैं।

    रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 'गीतांजलि', और उनके 'गीत वितान' से लगभग दो सौ गीतों का अनुवाद। बाङ्ला से ही बंकिमचन्द्र के निबन्धों के अनुवाद पर साहित्य अकादेमी का अनुवाद पुरस्कार। जीवनानन्द दास की कविताओं के अनुवाद भी प्रकाशित हैं। द्विजदेव सम्मान, शरद जोशी सम्मान, श्रीनरेश मेहता वाङ्मय स्मृति सम्मान, आदि पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

    दिल्ली और भोपाल में रहकर स्वतन्त्र लेखन।

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