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Urdu Ki Aakhiree Kitab

Urdu Ki Aakhiree Kitab

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  • Pages: 154p
  • Year: 2016, 7th Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126700455
  •  
    उर्दू की आखिरी किताब उर्दू में तंजश्निगारी (व्यंग्य) के जो बेहतरीन उदाहरण मौजूद हैं उनमें इब्ने इंशा का अंदाजश् सबसे अलहदा और प्रभाव में कहीं ज्श्यादा गहरा, कहीं ज्श्यादा तीक्ष्ण है। इसका कारण है उनकी यथार्थपरकता, उनकी स्वाभाविकता और उनकी बेतकल्लुफश्ी। उर्दू की आखिश्री किताब उनकी इन सारी ख्शूबियों का मुजश्स्सिम नमूना है।... यह किताब पाठ्य-पुस्तक शैली में लिखी गई है और इसमें भूगोल, इतिहास, व्याकरण, गणित, विज्ञान आदि विभिन्न विषयों पर व्यंग्यात्मक पाठ तथा प्रश्नावलियाँ दी गई हैं। इस ‘आखिश्री किताब’ जुम्ले में भी व्यंग्य है कि छात्रों को जिससे विद्यारम्भ कराया जाता है वह प्रायः ‘पहली किताब’ होती है और यह ‘आखिश्री किताब’ है। इंशाजी का व्यंग्य यहीं से शुरू होता है और शब्द-ब-शब्द तीव्र होता चला जाता है। इंशाजी के व्यंग्य में यहाँ जिन चीजशें को लेकर चिढ़ दिखाई पड़ती है, वे छोटी-मोटी चीजेंश् नहीं हैं। मसलन - विभाजन, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की अवधारणा, कशयदे-आजश्म जिन्ना, मुस्लिम बादशाहों का शासन, आजशदी का छर्,िं शिक्षा-व्यवस्था, थोथी नैतिकता, भ्रष्ट राजनीति, आदि। और अपनी सारी चिढ़ को वे बहुत गहन-गम्भीर ढंग से व्यंग्य में ढालते हैं - इस तरह कि पाठक को लज्श्जश्त भी मिले और लेखक की चिढ़ में वह खुश्द को शामिल भी महसूस करे।

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    Ibne Insha

    जन्म: सन् 1927 का कोई महीना।

    जन्म-स्थान: लुधियाना (पंजाब)। प्रारम्भिक शिक्षा लुधियाना में ही। बाद में पाकिस्तान बनने के बाद ‘पाकिस्तानी’ बनना पड़ा। 1949 में करांची आ बसे। वहीं उर्दू कॉलेज से बी.ए. किया।

    माँ-बाप का दिया नाम शेर मोहम्मद खाँ, लेकिन कमसिनी में ही स्वयं को इब्ने इंशा कहना और लिखना शुरू कर दिया और अन्ततः यही नाम असली हुआ।

    उर्दू के प्रख्यात कवि और व्यंग्यकार। लहजे में मीर की खस्तगी और नज़ीर की फ़कीरी। आजीवन दुनिया-भर में घूमते रहे। समाज के सुख-दुख से गहरा रिश्ता रखते हुए मनुष्य की स्वाधीनता और स्वाभिमान के प्रबल पक्षधर रचनाकार। हिन्दी भाषा के अच्छे जानकार थे। उर्दू-रचनाओं में हिंदी में ख़ूबसूरत प्रयोगों की भरमार है। हिन्दी-ज्ञान के बल पर ही शुरू में ऑल इंडिया रेडियो पर काम किया। बाद में क़ौमी किताब घर के निदेशक, इंग्लैंड स्थित पाकिस्तानी दूतावास में सांस्कृतिक मंत्री और फिर पाकिस्तान में यूनेस्को के प्रतिनिधि रहे।

    11 जनवरी, 1978 को लंदन में कैंसर से मृत्यु।

    प्रमुख पुस्तकें: उर्दू की आखिरी किताब (व्यंग्य-संग्रह); चाँदनगर, इस बस्ती के इस कूचे में (कविता-संग्रह); बिल्लू का बस्ता, यह बच्चा किसका बच्चा है (बाल कविताएँ)।

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