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Uttal Umang

Uttal Umang

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  • Pages: 179p
  • Year: 2007
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126714049
  •  
    सुभाष घई पिछले तीन दशक ६ जनरत हैं । एक नाचीज से शुरू हुई उनकी रचना-या त्रा शिखर-संधान करते हुए आज भी जारी है । 'कालीचरण' की शुरुआत का अनजाना व्यक्तित्व हिन्दी सिनेमा में एक प्रतिमान की तरह स्थापित हो चुका है । इस तरह कि उसकी कठोरतम आलोचना भी की जा सकती है लेकिन उपेक्षा नहीं । आज सुभाष घई एक विशाल कारपोरेट साम्राज्य के शीर्षपुरुष हैं । उनकी निर्माण संस्था के अन्तर्गत अनेक फिल्मकार फिल्में बना रहे हैं । फिल्म निर्माण से सम्बन्धित अनेक उपक्रमों के वे मालिक हैं । उन्होंने अपनी पिछली कई फिल्में खुद ही प्रदर्शित की हैं और अब वितरण व्यवसाय में भी प्रवेश कर चुके हैं । उनका इरादा फिल्म निर्माण से सम्बन्धित प्रशिक्षण देने वाला एक विराट संस्थान भी आरम्भ करने का है, कहा जाता है कि उसकी सारी तैयारियाँ पूरी कर ली गई हैं । पर हमारे लिए या कहना चाहिए कि सिनेमा के आशिकों के लिए सबसे बढ्‌कर महत्त्व का उनका फिल्मकार व्यक्तित्व है जिसने उन्हें लाखों दिलों की चाहतों में शामिल किया है । हमारी यह किताब सुभाष घई के फिल्मकार व्यक्तित्व से ही मुखातिब है जिसका हमसे पिछले तीन दशकों में लगातार प्रगाढ़ सम्बन्ध बनता चला गया ।

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    Prahlad Agarwal

    प्रह्लाद अग्रवाल

    यायावर, आवारामिज़ाज। संगीत, साहित्य और सिनेमा से गहरी आशि$की। पिछले तीन दशकों में बहुआयामी लेखन। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशन।

    शासकीय स्वशासी महाविद्यालय में प्राध्यापक-पद से सेवानिवृत्त।

    प्रकाशित पुस्तकें :

    हिन्दी कहानी : सातवाँ दशक (आलोचना); तानाशाह (उपन्यास); राजकपूर : आधी हकीकत आधा फसाना, प्यासा : चिर अतृप्त गुरुदत्त, कवि शैलेन्द्र : जि़न्दगी की जीत में यकीन, उत्ताल उमंग : सुभाष घई की फिल्मकला, बाज़ार के बाजीगर : इक्कीसवीं सदी का सिनेमा, ओ रे मांझी... : बिमलराय का सिनेमा, जुग जुग जिए मुन्नाभाई : छवियों का मायाजाल, रेशमी ख़्वाबों की धूप-छाँव : यश चोपड़ा का सिनेमा, महाबाज़ार के महानायक (सिनेमा)।

    ‘प्रगतिशील वसुधा’ के बहुचर्चित फिल्म विशेषांक ‘हिन्दी सिनेमा : बीसवीं से इक्कीसवीं सदी तक’ का सम्पादन एवं कई पुस्तकों के सहयोगी लेखक।

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