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Uttar Aadhunikta : Bahuayami Sandarbh

Uttar Aadhunikta : Bahuayami Sandarbh

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  • Pages: 314p
  • Year: 2010
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180314827
  •  
    अधिवृत्तान्त और महावृत्तान्त को खारिज करने वाली तथा अपनी बहुआयामिता में विश्वव्यापी उत्तर-आधुनिकता लगातार बौद्धिकों की मीमांसा का विषय रही है । पर हिन्दी में अब तक इसे इसकी व्यापकता में न देखकर उत्तर- संरचनावाद, नव्य पूँजीवाद और विश्व-बाजारवाद से ही जोड़कर विवेचित किया गया है । उत्तर- आधुनिकता का सरोकार वास्तुकला से स्थापत्य और अभिकल्पन कला तक; सर्जनात्मक और आलोचनात्मक साहित्य से सौन्दर्यशास्त्र, डी-कंस्ट्रक्शन और उत्तर-मार्क्सवाद तक; संस्कृति और स्त्रीवाद से समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र. दर्शन, विधि और विज्ञान तक; संगीत, चित्र और छायाचित्र से फिल्म, वीडियो, दूरदर्शन और संचार-माध्यमों के प्रौद्योगिकीय विस्फोट तक व्याप्त है । यह पुस्तक इस व्यापकता को निरूपित करती है तथा गहनता में जाकर यह बताती है कि उत्तर-आधुनिकता के नाभिकेन्द्र में 'इच्छा' सक्रिय है । यह 'विवेक' को केन्द्र में रखने वाली आधुनिकता को नष्ट-भ्रष्ट कर चुकी है । यह ज्ञान को शक्ति मानती है- ६ लेंग्‍यूज 10680 श्पावरह उत्पादन, श्रम और इतिहास के अन्त की घोषणा कर चुकी है, साथ ही मूल्य- मीमांसा को खारिज भी । पर यह न्याय-व्यवस्था में विश्वास रखती है, यह मानती है कि न्याय लोगों के आत्म-निर्धारण में बसता है । यदि ल्योतार का विश्वास 'ब'बहुईश्वरवादी'र 'मूर्तिपूजावाद' में है, तो बौद्रिआ अमेरिकी 'वाटरगेट स्कैंडल' और 'डिस्नीलैण्ड' -दोनों को उत्तर-आधुनिक अधि-यथार्थ मानता है 1 उत्तर-आधुनिक संसार अधि-यथार्थ का छाया- संसार है । इस पुस्तक में पहली बार उत्तर-आधुनिकता को तुलनात्मक, आलोचनात्मक, चिन्तकीय, स्त्रीवादी, मार्क्सवादी, उत्तर- मार्क्सवादी और बहुआयामी सन्दर्भों में विवेचित किया गया है । यह पुस्तक पहली बार 18 उत्तर-आधुनिक चिन्तकों, सर्जकों, कलाकारों और उनकी मान्यताओं से आपको परिचित कराती है । उत्तर-आधुनिक समय, स्थल और चिन्तकीय विमर्श से परिचित होने के लिए हिन्दी में एकमात्र पठनीय अद्‌यतन प्रामाणिक पुस्तक ।

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    Pandey Shashibhushan Shitanshu

    पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु'
    जन्म : 13 मई 1941
    शिक्षा : पी-एच. डी. (हिन्दी), डी. लिट् (भाषा- विज्ञान), स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) ।
    व्यक्तित्व : सैद्धान्तिक और सर्जनात्मक आलोचक । साहित्य-सिद्धान्त, साहित्य-विश्लेषण और प्रत्यालोचन के लिए सिद्ध-प्रसिद्ध । व्यापक, गहन अध्ययन एवं मौलिक संदृष्टि से सम्पन्न भाषाविज्ञानी । प्रखर, तार्किक वक्ता एवं लेखक ।
    वृत्ति : अध्यापन 1961 - 77 भागलपुर विश्वविद्यालय सेवा में व्याख्याता । 1977- 85 गुरुनानकदेव विश्वविद्यालय (अमृतसर) में हिन्दी के वरिष्ठ रीडर । 1985 पूना विश्वविद्यालय (पुणे) में हिन्दी भाषा के प्रोफेसर । कुछ ही समय बाद 1985 में गुनाके, विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर । 1986-  1989 वहीं हिन्दी विभाग में प्रोफेसर-अध्यक्ष ।  1992 - 1994 वहीं भाषा-संकाय के अधिष्ठाता ।  1992, 95 भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद भारत सरकार (नयी दिल्ली) द्वारा क्रमश: त्रिनिदाद और पेइचिंग के लिए विजिटिंग प्रोफेसर पद पर चयनित । फरवरी 200 -जनवरी 2007 महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय (वर्धा) में विजिटिंग प्रोफेसर । सम्पादन : 01 फरवरी 2007-30 अप्रैल  2008 वहीं वरिष्ठ अतिथि सम्पादक के बतौर तुलनात्मक साहित्य विश्वकोश (1350 पृष्ट) तैयार किया । जुलाई 2008 में विश्वकोश प्रकाशित ।
    उच्चतर शोध एवं शोध-निर्देशन : यूजीसी. (नई दिल्ली) द्वारा संभरित दो बृहत् शोध-परियोजनाएँ ससम्पन्न-1गुरुमुखी लिपि में उपलब्ध हिन्दी साहित्य : समाज-सांस्कृतिक अध्ययन, 2. रामचरितमानस : संकेत- विसंरचनात्मक शैलीवैज्ञानिक सन्दर्भ । अब तक 48 पी-एच. डी. एवं 57 एम.फिल. शोधार्थियों को अपने ससफल निर्देशनमें उउपाधि दिलायी।
    अवकाश-ग्रहण : 30 जून, 2001
    लेखन : अब तक प्रकाशित 300 से अधिक शोधपत्र एवं  26 पुस्तकें ।

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