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Uttar Bayan Hai

Uttar Bayan Hai

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  • Pages: 298p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788171198245
  •  
    फैसले के मुताबिक मायके वाले बांद के विवाह के वक्“त उन्हें दी गई रकम ससुराल वालों को लौटाने लगे हैं । गवाहों के सामने पूरी रकम लौटाई जाने लगी है । रवीजी खोलकर बोल रहे हैं-गवाह लोग एक बार रकम की गिनती अपने हाथ से भी करके देख लें । गवाहों को भी अपनी निशानी अंगूठा लगानी है । रवीजी हर काम को हमेशा ठीक ढंग से किए जाने पर ज़ोर देते हैं । छूट की लिखत पर संबंधित पक्षकार के अंगूठों के ठप्पे लगा लिए गए हैं । दाम का नगद भुगतान हो गया है । लिखत के बाद पहला पक्ष वहाँ से अपने घर चला गया है । उसका अब इस बात से कोई मतलब नहीं रह गया, बांद कहां जाती है । बांद जाए चूल्हे भाड़ में । उनकी बला से । मोल की रकम के वापिस कर दिए जाने के बाद बांद पर अब ससुराल वालों का कोई अधिकार नहीं रह गया । वह फिर से मायके वालों की जायदाद हो गई है । अपने कब्जे में वापिस लौट आई बांद नामक जायदाद का, एक बार की विवाहिता बांद का फिर दुबारा मोल–भाव किया जाने लगा है । उसे नए आदमी के पास, पहले से दुगुने भाव पर बेचा जा रहा है । उसके पहले विवाह से आज के दिन तक गाय–भैंसों और औरतों के भाव बहुत महंगे हो गए हैं । तब जिस मोल कुंवारी कन्या मिल जाती थी, आज उस भाव दो–घरिया भी नहीं मिलती । जमाने की तासीर है, किसी का क्या दोष ? बदन में खून रहने तक इस बांद को इसी तरह बिकते रहना है । जायदाद का और औरत का हमेशा कोई–न–कोई सरपरस्त होना चाहिए । एक पल के लिए भी उसे सरपरस्त के बगैर नहीं छोड़ा जा सकता ।

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    Vidya Sagar Nautiyal

    विद्यासागर नौटियाल

    29 सितम्बर 1933 को उत्तर भारत के एक सामन्ती राज्य टिहरी-गढ़वाल में भागीरथी के तट पर बसे प्रसिद्ध गाँव मालीदेवल में वन-अधिकारी पिता नारायणदत्त तथा माता रत्ना के द्वितीय पुत्र तथा तृतीय संतान के रूप में जन्म। इस गाँव ने प्रसिद्ध सन्त स्वामी रामतीर्थ को अपनी ओर आकर्षित किया था और उन्होंने अपने स्थायी निवास के लिए यहाँ कुटिया का निर्माण करवाया था। बाद में स्वतंत्रता सेनानी काका कालेलकर ने भी अपने भूमिगत जीवन के छः माह इसी गाँव में बिताए थे।

    शिक्षा: प्राथमिक शिक्षा माता-पिता से, रियासत के विद्यालयविहीन सुदूर जंगलों में अपने घर पर। बाद में टिहरी, देहरादून तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में।

    प्रजामंडल के सामंतविरोधी आंदोलन में सक्रियता के कारण भारत की आज़ादी के बाद पहली गिरफ्तारी 18 अगस्त, 1947 को टिहरी रियासत में। पचास वर्षों में फैला हुआ रचना-कर्म और जन-आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी। 1958 में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के उदयपुर अधिवेशन में राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित। 1980 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के रूप में देवप्रयाग टिहरी-गढ़वाल से उत्तर प्रदेश विधानसभा सदस्य। 1969 से 1995 तक वकालत।

    कृतियाँ: पहली कहानी मूक बलिदान 1949 में लिखी। भैंस का कट्या 1954 में कल्पना में प्रकाशित। उपन्यास:  उलझे रिश्ते 1958, भीम अकेला 1995, सूरज सबका है 1997 तथा उत्तर बायाँ है 2003 में प्रकाशित। कथा-संग्रह: टिहरी की कहानियाँ 1984 में, टिहरी की कहानियाँ 2000 में तथा सुच्ची डोर 2003 में प्रकाशित। यात्रा-वृत्तांत, संस्मरण, डायरी अंश तथा वैचारिक लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

    सम्प्रति: स्वतंत्र रचना-कर्म।

    सम्पर्क: डी-8, नेहरू कालोनी, धर्मपुर, देहरादून, उत्तराखंड-248 001

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