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Yagyavalkya Se Bahas

Yagyavalkya Se Bahas

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  • Pages: 174p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126715367
  •  
    याज्ञवल्क्य से बहस सुमन केशरी की कविताएँ मौजूदा काव्य-परिदृश्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाती हैं। इनमें समकालीन दौर की बेचैनियाँ भी हैं और परम्परा का परीक्षण और पुनर्परीक्षण भी। ये कविताएँ यह एहसास कराती हैं कि याज्ञवल्क्य और गार्गी के बीच सम्बन्ध का व्याकरण बदल गया है। गार्गी अब मनचाहे सवाल कर सकती है और उसे याज्ञवल्क्य के उत्तर की दरकार भी नहीं। हिन्दी में समकालीन कवयित्रियों की जो पीढ़ी पिछले पन्द्रह-बीस वर्षों से सक्रिय है और अपनी जगह बना चुकी है सुमन केशरी उन्हीं की समवयस्क हैं। इस हिसाब से उनका पहला काव्य-संकलन देर से आ रहा है हालाँकि कविताएँ वे काफ़ी पहले से लिख रही हैं। इस देरी की क्या वजह हो सकती है? शायद यह कि अभी भी भारतीय समाज में आम औरत पर परिवार और बच्चों के पालने के इतने दबाव हैं कि उसकी सर्जनात्मकता के पूर्ण प्रस्फुटन में अन्तराल आते रहते हैं। सम्भवतः यही कारण है कि अपनी एक कविता में सुमन केशरी यह कहती हैं - सृजन के बीहड़ों में मैंने क़दम रखा। कई साल बाद। रो...रो... कर...। यह काव्य-पंक्ति सिर्फ एक कवयित्री का वक्तव्य- भर नहीं है बल्कि इसके गहरे सामाजिक आशय हैं। भारतीय समाज में औरत के लिए घर के बाहर की सृजनात्मक दुनिया अभी भी एक बीहड़ प्रदेश है। इस संग्रह की एक अन्य विशेषता इसमें हिन्दी कविता की कई स्मृतियों का मौजूद होना है। इनको पढ़ते हुए कभी निराला की ‘राम की शक्तिपूजा’ की याद आती है तो कभी विजय देव नारायण साही की कविताएँ। आधुनिक हिन्दी काव्य-परम्परा का एक मिज़ाज भारतीय मिथकों को नए प्रसंग में जाँचने-परखने का भी रहा है। इस संग्रह में भी ऐसी कई कविताएँ हैं। पर ऐसी कविताएँ भी यहाँ हैं जो हमारे समकालीन अनुभवों का हिस्सा हैं, जैसे ‘सिपाही’, जिसमें अनाम से दिखनेवाले वर्दीधारी की ज़िन्दगी की वे परतें खुलती हैं जिनके बारे में हम अक्सर सजग नहीं होते। जिन्हें हम रोज़ गली-मुहल्ले, सड़क, बाजार या सीमा पर देखते हैं मगर सिर्फ़ उनकी उपस्थिति के बारे में जानते हैं, उनके एहसासों से वाक़िफ़ नहीं होते। इसी तरह ‘बा और बापू’ कविता गांधी और कस्तूरबा के निजी सम्बन्धों को एक नई व्याप्ति देती है जहाँ एक ऐतिहासिक लड़ाई में शामिल हो व्यक्ति एक ऐसी विडम्बना में उलझकर रह जाते हैं जहाँ निजी दुखान्त को प्राप्त होता है। - रवीन्द्र त्रिपाठी

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    Suman Keshari

    बिहार के मुज्जफरपुर में जन्मीं सुमन केशरी ने दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से बी.ए करने के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम.ए. और सूरदास के भ्रमरगीत पर शोधकार्य किया।

    जीवन वास्तव के विभिन्न रंगरूपों को समझने-छूने की उत्सुकता के कारण सुमन ने यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया, पर्थ से 2001 में मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की उपाधि हासिल की। अपनी इसी उत्सुकता और जिज्ञासा के कारण, जनवरी 2013 में उन्होंने भारत सरकार में निदेशक पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति भी ले ली। इस समय वे महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से मानव अधिकार की संस्कृति और मीराबाई की लोकसुरक्षित स्मृतियाँ विषय पर डी.लिट. कर रही हैं।

    अनछुए विषयों तक संश्लिष्ट बोध और सघन संवेदना के साथ जाना सुमन केशरी के काव्य मुहावरे की विशिष्ट पहचान है।

    याज्ञवल्क्य से बहस (2008) संकलन के अलावा सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।

    उन्होंने जे.एन.यू. में नामवर सिंह (2009) नामक एक अत्यन्त चर्चित पुस्तक का सम्पादन किया है।

    सुमन केशरी ने अपर के.जी. से लेकर कक्षा आठ तक की हिन्दी पाठ्य पुस्तकों: सरगम और स्वरा: का भी निर्माण किया है।

    फोटो: ऋतंभरा अग्रवाल

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