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प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह जी नहीं रहे...

“मैं जिसका हूँ वही नित्य निज स्वर में भर कर मुझे उठाएगा सहस्र कर पद का सहचर जिसकी बढ़ी हुई बाँहें ही स्वर शर भास्वर मुझ में ढल कर बोल रहे जो वे समझेंगे अगर दिखेगी कमी स्वयं को ही भर लेंगे।”

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