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Aaivanho

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  • Pages: 100p
  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183613590
  •  
    जब एशबी के मैदान में आइवनहो बेहोश होकर गिर पड़ा था और सारी दुनिया उसका परित्याग कर चुकी थी तब रेबेका ने ही अपने पिता को राज़ी किया कि आइवनहो को अपने निवास-स्थान पर ले जाए। रेबेका ने खुद अपने हाथ से उसके घावों पर पट्टियाँ बाँधीं। घर पहुँचने के बाद भी आइवनहो काफ़ी खून निकल जाने के कारण देर तक बेहोश रहा। रेबेका ने कहा कि घाव गहरे नहीं हैं और अगर बुखार नहीं आया तो यार्क की यात्रा नुक़सानदेह नहीं होगी। आइज़क ज़्यादा-से-ज़्यादा वहीं अच्छा होने के लिए छोड़ जाना चाहता था, लेकिन रेबेका ने उसको अपने साथ ले जाने के लिए दो तर्क दिए। एक तो वह अपने बहुमूल्य मरहम की शीशी को किसी दूसरे चिकित्सक को नहीं दे सकती। दूसरे, घायल नाइट आइवनहो का विल्फ्रेड सिंह-हृदय रिचर्ड का घनिष्ठ मित्र है और चूँकि आइज़क ने उसके भाई जॉन को विद्रोहपूर्ण कार्यों के लिए काफ़ी पैसा दिया है इसलिए उसको रिचर्ड के लौटने पर ऐसे शक्तिशाली संरक्षकों की ज़रूरत पड़ेगी। काले नाइट ने कहा, ‘‘एक कुलीन महिला का सम्मान खतरे में है।’’ भले रिसालेदार ने कहा, ‘‘बेचारे वफ़ादार मसखरे वाम्बा का बाल भी बाँका हुआ तो मैं ईंट-से-ईंट बजा दूँगा !’’ काले नाइट ने लाक्सले से कहा, ‘‘यह अच्छा हो कि सेड्रिक इस हमले का नेतृत्व करे।’’ लेकिन सेड्रिक ने युद्ध-कौशल में अनभिज्ञता प्रकट करते हुए कहा कि वह अगली पंक्ति में ज़रूर रहेगा, पर नेतृत्व करना उसके वश का नहीं है। लाक्सले ने तीरन्दाज़ों का दिग्दर्शन करने का काम अपने ऊपर लिया। फिर काले नाइट को इस सेना का सूत्र सँभालना पड़ा और पहला हमला शुरू हो गया। ु सर वाल्टर स्कार्ट का प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास।

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    Sir Valter Scot

    वाल्टर स्कॉट का जन्म 1771 ई. में स्कॉटलैंड में एडिनबरा में हुआ था। वहीं विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे कुछ दिन अपने वकील पिता के सहायक रहे, फिर इक्कीस वर्ष की आयु में स्वतन्त्र वकालत शुरू की। अवकाश के समय में उन्होंने स्कॉटलैंड के लोकगीत एकत्रित किए तथा गेटे आदि जर्मन कवियों के अनुवाद भी प्रकाशित कराए। कुछ ही समय बाद वे क्रमशः छापाखाने और प्रकाशन के व्यवसाय में साझीदार बन गए और ड्राइडेन, स्विफ़्ट आदि की रचनाओं के उन्होंने जीवनी-सहित सुसम्पादित संस्करण प्रकाशित किए।

    वाल्टर स्कॉट की कविताएँ काफ़ी लोकप्रिय थीं। यहाँ तक कि 1813 ई. में उन्हें ग्रेट ब्रिटेन का राजकवि बनाने का भी प्रस्ताव हुआ पर उन्होंने स्वयं राबर्ट सदे को उस ओहदे के उपयुक्त बताकर खुद राजकवि बनना अस्वीकार कर दिया। उस दौरान कवि के रूप में बायरन की बहुत ख्याति थी। उसके सामने अपनी ख्याति दबती देखकर वाल्टर स्कॉट ने 1814 ई. में ऐतिहासिक उपन्यास लिखने शुरू किए। प्रारम्भ में सारे उपन्यास अनाम छपे। 1820 ई. में उन्हें ‘सर’ की उपाधि मिली और 1827 ई. में उपन्यासों पर लेखक के रूप में उनका नाम छपना शुरू हुआ। उन्होंने अनेक नाटक भी लिखे पर इस क्षेत्र में उन्हें उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली। उनका अन्तिम उपन्यास उनकी मृत्यु के एक वर्ष पूर्व, 1831 ई. में प्रकाशित हुआ था।

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