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Aalochana Se Aagey

Aalochana Se Aagey

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  • Pages: 220p
  • Year: 2019, 3rd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788171195688
  •  
    उत्तर-आधुनिकतावाद हिंदी में अब एक निर्णायक विमर्श बन चला है और उत्तर-संरचनावादी ‘पाठ’ की रणनीतियाँ हिंदी साहित्य की उपलब्ध व्याख्याओं में नए-नए विपर्यास और उपद्रव पैदा कर रही हैं। विखंडनवादी पाठ-प्रविधियों ने हिंदी में नव्य-समीक्षा को रिटायर कर दिया है। ‘आलोचना’ पद भी, अपनी व्यतीत आधुनिकतावादी प्रकृति और उत्तर-संरचनावादी रणनीतियों की मार के चलते, संकटग्रस्त होकर संदिग्ध हो चला है। ये दिन आलोचना के ‘विमर्श’ में बदल जाने के दिन हैं। विमर्श जो ‘अर्थ’ का ‘उत्पादन’ ही नहीं करते, उन्हें ‘संगठित’ भी करते हैं और अनिवार्यत: सत्तात्मक होते हैं। विमर्श वस्तुत: आलोचना का विखंडन है, इसीलिए आलोचना से आगे है। सुधीश पचौरी ने उत्तर-आधुनिकतावादी और उत्तर-संरचनावादी विमर्शों को हिंदी में स्थापित किया है। लगभग दो दशक के सभी अग्रगामी विमर्श, इन उत्तर-आधुनिकतावादी और उत्तर-संरचनावादी पदावलियों से उलझते-सुलझते चलते हैं। समाजशास्त्रों में इन्हें लगातार जगह मिल रही है। साहित्याध्ययनों में, पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों में और शोधों में ये विमर्श निर्णायक होने लगे हैं। ये वर्तमान की माँग हैं और उसका भवितव्य भी। सुधीश पचौरी की यह किताब हिंदी के जागरूक पाठकर्ताओं के लिए एक जरूरी किताब है।

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    Sudhish Pachauri

    सुधीश पचौरी

    जन्म : 29 दिसंबर, 1948; अलीगढ़ (उ.प्र.)।

    शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी, आगरा विश्वविद्यालय), पीएच.डी. एवं पोस्ट डॉक्टोरल शोध (हिन्दी, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली)।

    दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर। अब सेवा-निवृत्त।

    माक्र्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तंभकार, मीडिया-विशेषज्ञ, भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार से सम्मानित।

    प्रकाशित पुस्तकें : नई कविता का वैचारिक आधार; कविता का अंत; निर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवाद; दूरदर्शन की भूमिका; दूरदर्शन: स्वायत्तता और स्वतंत्रता (सं.); नए जन-संचार माध्यम और हिन्दी (सं.); उत्तर-आधुनिकता और उत्तर-संरचनावाद; नवसाम्राज्यवाद और संस्कृति; दूरदर्शन : दशा और दिशा; नामवर के विमर्श (सं.); दूरदर्शन : विकास से बाजार तक; उत्तर-आधुनिक साहित्यिक विमर्श; मीडिया और साहित्य; उत्तर-केदार (सं.); देरिदा का विखंडन और साहित्य; साहित्य का उत्तरकांड : कला का बाजार; टीवी टाइम्स; इक्कीसवीं सदी का पूर्वरंग; अशोक वाजपेयी : पाठ-कुपाठ; प्रसार भारती और प्रसारण-परिदृश्य; साइबर-स्पेस और मीडिया; स्त्री देह के विमर्श; आलोचना से आगे; हिन्दुत्व और उत्तर-आधुनिकता; मीडिया, जनतंत्र और आतंकवाद; ब्रेक के बाद; बिंदास बाबू की डयरी; पॉपूलर कल्चर; फासीवादी संस्कृति और सेकूलर पॉप-संस्कृति; साहित्य का उत्तर-समाजशास्त्र आदि।

    सम्प्रति : वाक् त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका का सम्पादन।

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