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Ajnabi Jazeera

Ajnabi Jazeera

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  • Pages: 144p
  • Year: 2017, 2nd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180317361
  •  
    हिन्दी की वरिष्ठ कथाकार नासिरा शर्मा के लेखन की सर्वोपरि विशेषता है सभ्यता, संस्कृति और मानवीय नियति के आत्मबल व अन्तःसंघर्ष का संवेदना-सम्पन्न चित्राण। उनके कथा साहित्य के सरोकार ग्लोबल हैं। उनका कथाकार सन्तप्त और उत्पीडि़त मनुष्यता के पक्ष में पूरी शक्ति के साथ निरन्तर सक्रिय रहा है। ‘अजनबी जज़ीरा’ नासिरा शर्मा का नया उपन्यास है। ‘अजनबी जज़ीरा’ में समीरा और उसकी पाँच बेटियों के माध्यम से इराक़् की बदहाली बयान की गई है। ग़ौरतलब है कि दुनिया में जहाँ कहीं ऐसी दारुण स्थितियाँ हैं, यह उपन्यास वहाँ का एक अक्स बन जाता है। छोटी-से-छोटी चीज़ को तरसते और उसके लिए विरासतों-धरोहरों-यादगारों को बाज़ार में बेचने को मजबूर होते लोग; जि़न्दगी बचाने के लिए सब कुछ दाँव पर लगाती औरतें और विदेशी आक्रमणकारियों की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष निगरानी में साँस लेते नागरिकदृऐसी अनेक स्थितियों-मनःस्थितियों को नासिरा शर्मा ने इस उपन्यास के पृष्ठों पर साकार कर दिया है। पतिविहीना समीरा अपनी युवा होती बेटियों के वर्तमान और भविष्य को लेकर फिक्रमन्द है। बारूद, विध्वंस और विनाश के बीच समीरा जि़न्दगी की रोशनी व ख्शुशबू बचाने के लिए जूझ रही है। उपन्यास समीरा को चाहने वाले अंग्रेज़ फौजी मार्क के पक्ष से क्षत-विक्षत इराक़् की एक मार्मिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। समीरा और मार्क की प्रेमकहानी अद्भुत है, जिसमें जिम्मेदारियों के हस्सास रंग शिद्दत से शामिल हैं। घृणा और प्रेम का सघन अन्तर्द्वन्द्व इसे अपूर्व बनाता है। लेखिका यह भी रेखांकित करती है कि ऐसे परिदृश्य में स्त्री-विमर्श के सारे निहितार्थ सिरे से बदल जाते हैं। सभ्य कहे जानेवाले आधुनिक विश्व में विध्वंस का यह यथार्थ स्तब्ध कर देता है। विध्वंस की इस राजनीति में क्या-क्या नष्ट होता है, इसे नासिरा शर्मा के बेजोड़ रचनात्मक सामर्थ्य ने ‘अजनबी जज़ीरा’ में अभिव्यक्त किया है।

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    Nasira Sharma

    नासिरा शर्मा

    नासिरा शर्मा का जन्म सन् 1948 में इलाहाबाद में हुआ। उन्होंने फारसी भाषा और साहित्य में एम.ए. किया। हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी, पश्तो एवं फारसी पर उनकी गहरी पकड़ है। वह ईरानी समाज और राजनीति के अतिरिक्त साहित्य, कला व संस्कृति विषयों की विशेषज्ञ हैं। इराक अफगानिस्तान, पाकिस्तान व भारत के राजनीतिज्ञों तथा प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों के साथ उन्होंने साक्षात्कार किए, जो बहुचर्चित हुए। ईरानी बुद्धिजीवियों पर जर्मन व फ्रांसीसी दूरदर्शन के लिए बनी फिल्म में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। सर्जनात्मक लेखन में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के साथ ही स्वतंत्र पत्रकारिता में भी उन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया है।

    प्रकाशन

    उपन्यास : ‘सात नदियाँ एक समन्दर’, ‘शाल्मली’, ‘ठीकरे की मंगनी’,‘जि़ंदा मुहावरे’, ‘कुइयाँ जान’, ‘ज़ीरो रोड’, ‘अक्षयवट’, ‘अजनबी ज़जीरा’, ‘पारिजात’, ‘कागज़ की नाव’, ‘शब्द पखेरु’, ‘दूसरी जन्नत’।

    कहानी-संग्रह : ‘शामी कागज़’, ‘पत्थर गली’, ‘संगसार’, ‘इब्ने मरियम’, ‘सबीना के चालीस चोर’,  ‘खुदा की वापसी’, ‘बुतखाना’, ‘दूसरा ताजमहल’, ‘इनसानी नस्ल’।

    ‘अफगानिस्तान : बुज़कशी का मैदान’ (संपूर्ण अध्ययन दो खंडों में), ‘मरजीना का देश इराक’।

    लेख-संग्रह : ‘राष्ट्र और मुसलमान’, ‘औरत के लिए औरत’, ‘औरत की दुनिया’, ‘वो एक कुमारबाज़ थी’, ‘औरत की आवाज़’।

    रिपोर्ताज : ‘जहाँ फौव्वारे लहू रोते हैं’।

    संस्मरण : ‘यादों के गलियारे’।

    अनुवाद : ‘शहनामा फिरदौसी’, ‘गलिस्तान-ए-सादी’, ‘किस्सा जाम का’, ‘काली छोटी मछली’, ‘पोयम ऑफ परोटेस्ट’, ‘बर्निंग पायर’, ‘अदब में बायीं पसली’।

    आलोचना : ‘किताब के बहाने’, ‘सबसे पुराना दरख्त’।

    विविध : ‘जब समय बदल रहा हो इतिहास’।

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