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Alice Ekka Ki Kahaniyan

Alice Ekka Ki Kahaniyan

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  • Pages: 104
  • Year: 2015
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183617918
  •  
    आदिवासी स्त्री लेखकों की रचनाएँ न सिर्फ भारतीय समाज के अदेखे बहुभाषायी और बहुसांस्कृतिक संसार को दर्ज करती हैं बल्कि पूर्वग्रहों और गैर-बराबरी से मुक्त एक स्वस्थ लोकतान्त्रिक समाज की पुनर्रचना के लिए उत्प्रेरित भी करती हैं ! यह इसलिए भी महत्तपूर्ण है क्योंकि आदिवासी स्त्री-लेखन न तो नारीवाद के प्रभाव से उपजा है और न ही दलितवाद की तरह किसी एक खास सामाजिक वर्ग से मुक्ति चाहता है ! आदिवासियों का सच एक अलग सांस्कृतिक विश्व है जहाँ आदिवासी स्त्रियाँ अपनी विशिष्ट स्त्रीगत समस्याओं पर बात करते हुए भी गैर-आदिवासी स्त्री-लेखन की तरह 'देह' की मुक्ति या 'पुरुष-सत्ता' के सवालों को नहीं उठातीं, बल्कि अपनी सामूहिक आदिवासी चेतना के कारन वे सीधे-सीधे उस विश्व से टकराती हैं जो श्रम और सृष्टि की अवमानना करता है ! जो इंसानी समाज का नस्लों, धर्मों, जातियों के आधार पर-रंग, भाषा और लिंग के आधार पर-भेदभाव करता हैं, उसका संकुचन व् संक्षेपण करता है; जैसाकि रोज केरकेट्टा सहजता से इस सच्चाई को उद्घाटित करती हैं : 'स्कूल के दिनों में ही साहित्य के विषय में हमें संक्षेपण करना सिखाया जाता है ! स्त्रियों के बारे में समाज भी हमें ऐसा ही नजरिया देता है ! हमारा समाज, इतिहास और साहित्य जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियों का संक्षेपण करता है- विशेषकर, हम आदिवासी स्त्रियों का ! हमारा लेखन ऐसे संक्षेपण के खिलाफ है !'

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    Vandana Tete

    वंदना टेटे

    जन्म : 13 सितम्बर, 1969

    सामाजिक कार्य (महिला एवं बाल विकास) में राजस्थान विद्यापीठ (राजस्थान) से स्नातकोत्तर।

    हिंदी एवं खड़िया में लेख, कविताएँ, कहानियाँ स्थानीय एवं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित तथा आकाशवाणी रांची (झारखंड) एवं उदयपुर (राजस्थान) से लोकगीत, वार्ता व साहित्यिक रचनाएँ प्रसारित।

    सामाजिक विमर्श की पत्रिका 'समकालीन ताना-बाना’, बाल पत्रिका 'पतंग’ (उदयपुर से प्रकाशित) का संपादन-प्रकाशन एवं झारखंड आंदोलन की राजनीतिक पत्रिका 'झारखंड खबर’ (रांची) का उप-संपादन। झारखंड की पहली बहुभाषायी पत्रिका 'झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ (2004), खड़िया मासिक पत्रिका 'सोरिनानिङ’ (2005) तथा नागपुरी मासिक पत्रिका 'जोहारसहिया’ (2006) का संपादन-प्रकाशन।

    प्रकाशित पुस्तकें : पुरखा लड़ाके, किसका राज है, झारखंड : एक अंतहीन समरगाथा, पुरखा झारखंडी साहित्यकार और नये साक्षात्कार, असुरसिरिंग, आदिवासी साहित्य : परंपरा और प्रयोजन और आदिम राग।

    2004 में आदिवासी व देशज लेखकों, भाषाविद्, संस्कृतिकर्मी, साहित्यकार और बुद्धिजीवियों के संगठन 'झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ की संस्थापक महासचिव।

    वर्तमान में झारखंड की आदिवासी एवं देशज भाषा-साहित्य व संस्कृति के संरक्षण, संवर्द्धन और विकास के लिए प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, रांची, के साथ सृजनरत।

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