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Asrare Khudi

Asrare Khudi

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  • Pages: 312p
  • Year: 2012
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183615709
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    इक़बाल की फ़ारसी मस्नवी ‘अस्रारे ख़ुदी’ (ख़ुदी या अहम् के रहस्य) एक दार्शनिक कविता है, जिसे ख़ुदी या अहम् ;म्हवद्ध अथवा आत्मन् ;ैमसद्धि के अर्थ, उसकी यथार्थता, अभिपुष्टि एवं स्थिरता का एक प्रकार का उपनिषद् कहा जा सकता है। यह कविता जगत् विषयक संकल्पना से प्रेरित होती है तथा अस्तित्व के महानाटक में मानवीय अहम् ;भ्नउंद म्हवद्ध या मानवीय आत्मशक्ति तथा उससे उद्भूत चारित्रिक एवं नैतिक गुणों की भूमिका का निरूपण करती है। कवि की भावप्रवणता तथा उस भावप्रवणता की सशक्त और प्रभावकारी अभिव्यक्ति की शैली इस दार्शनिक एवं तत्वमीमांसीय कविता को उच्चतर कविता के अवस्थान का अधिकारी बना देती है। स्पष्टतया यह एक विचार-प्रधान कविता है और कवि के विचार हृदयानुभूत हैं तथा उनकी अभिव्यक्ति प्रांजल एवं वाग्मितापूर्ण भाषा तथा उदात्त एवं मनोरम शैली में हुई है। प्रथम विश्वयुद्ध आरम्भ होने के एक वर्ष बाद 1915 में इसका प्रकाशन विश्व-साहित्य की एक अभूतपूर्व घटना थी, क्योंकि इसके पूर्व इस विषय को एक अनूठे अन्दाज़ में उदात्त काव्यात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करने का उदाहरण विश्व-साहित्य में नहीं मिलता। प्रकाशित होते ही यह कविता फ़ारसी क्लासिक बन गई तथा 1920 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध प्राच्यविद् प्रो. निकल्सन के अंग्रेजी अनुवाद के फलस्वरूप यह यूरोप व अमेरिका के पाठकों की पहुँच में आ गई। इसे विश्व-साहित्य की एक महान उपलब्धि क़रार देते हुए प्रसिद्ध अमेरिकी कवि, समालोचक तथा आधुनिक कला के दार्शनिक हर्बट रीड ;भ्मतइमतज त्मंकद्ध ने टिप्पणी की कि यह कविता ‘‘धारणाओं के नानात्व में से आस्था के एकत्व तथा विचारधाराओं के गुह्य तर्क में से एक वैश्विक स्फूर्ति का सृजन करती हुई अपनी सुन्दरता में आधुनिक दर्शन की आधारभूत अवस्थाओं को प्रतिबिम्बित करती है।’’ आख्यानों का प्रयोग वृतान्त में पाठकों की दिलचस्पी बनाए रखता है तथा कविता को सजीवता प्रदान करता है। ‘अस्रारे ख़ुदी’ की रचना के साथ फ़ारसी शाइरी में इक़बाल ने एक नये दबिस्तान ;ैबीववसद्ध और तर्ज़ की नींव डाली, जिसे आजकल ईरानी विद्वान ‘सब्के इक़बाल’ अर्थात् ‘इक़बालीय शैली’ ;प्ुइंसपंद ैजलसमद्ध कहते हैं। इक़बाल के काव्य और चिन्तन के अनुशीलन के लिए ‘अस्रारे ख़ुदी’ मूलाधारात्मक है।

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    Mohammad Iqabal

    मुहम्मद इक़बाल

    अल्लामा मुहम्मद इक़बाल (1876-1938) आधुनिक इस्लामी जगत् के एक मात्र दार्शनिक हैं जिन्होंने इस्लाम तथा इस्लामी संस्कृति के वैचारिक आधारों को अपने चिन्तन का विषय बनाया है। आधुनिक मनुष्य धार्मिक अनुभूति की एक ऐसी प्रणाली की अपेक्षा करता है जो मूर्त चिन्तन की आदतों वाले मन के लिए उपयुक्त हो। इस्लाम की धार्मिक परम्परा और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में होनेवाले नवीनतम विकास के परिप्रेक्ष्य में इस्लामी चिन्तन की पुनर्रचना में इक़बाल ने आधुनिक मन की अपेक्षाओं की पूर्ति का एक महत्‍वपूर्ण प्रयास किया है। पुनर्रचना में इक़बाल का उद्देश्य धर्म एवं विज्ञान के प्रवर्गों के माध्यम से उस यथार्थता की अभिपुष्टि एवं व्याख्या करना है जिसका संज्ञान धार्मिक अनुभूति द्वारा होता है। उनका मानना है कि आधुनिक मनोविज्ञान ने धार्मिक अनुभूति की अन्तर्वस्तुओं के मूल्यांकन और विश्लेषण पर ध्यान नहीं दिया है।

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