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Badalta Hua Desh : Swarndesh Ki Lok Kathayen

Badalta Hua Desh : Swarndesh Ki Lok Kathayen

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  • Pages: 143p
  • Year: 2020, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789389577761
  •  
    प्रस्तुत कहानियों के रचनाकार मनोज कुमार पांडेय अब तक हिन्दी जगत में अपनी पक्की पहचान बना चुके हैं। इनके पहले के तीन कहानी-संग्रह पुख्ता सबूत हैं कि इक्कीसवीं सदी के इस युवा रचनाकार ने कहानी का दामन मजबूती से थाम रखा है। मनोज के लेखन का सबसे गौरतलब पहलू यह है कि ये कहानी–लेखन के ढर्रे और फ्रेम को लगातार चुनौती देते चलते हैं। खुद तोड़-फोड़ करते हैं और कहानी की कहन को कई कदम आगे ले जाते हैं। इन कहानियों की प्रतीक-योजना बड़ी प्रत्यक्ष प्रणाली से उजागर है। लेखक ने हर कहानी में नए सिरे से जोखिम उठाया है। स्थितिगत व्यंग्य की विद्रूपता अन्य किसी प्रणाली से व्यक्त की भी नहीं जा सकती। कहानियों को इस परिप्रेक्ष्य में समझे जाने की जरूरत है। इन कहानियों में यदि आख्यान की सादगी है तो कबीर की तरह उद्देश्य की खड़ी चोट भी है। कहानी केवल राजा और प्रजा की नहीं रहती, वरन् यह जन और तंत्र की हो जाती है। इन्हें पढ़कर लगता है कि आज के समय की आँख में उँगली डालकर सच्चाई दिखाने का काम लेखक के जिम्मे है। ये कहानियाँ अपनी सरलता में जटिल यथार्थ की दस्तावेज हैं। मनोज समय के सघन अँधेरों पर रचनाओं की रोशनी और रोशनाई डाल कर बताते हैं; बचो, बचो, इस फैलते अंधकार से बचो। यही एक लेखक का कर्तव्य होता है। –ममता कालिया गहरे प्रेक्षण, बदलावों को पकड़ने वाली अचूक संवेदनशीलता और समर्थ कथा-भाषा से मनोज कुमार पांडेय ने इक्कीसवीं सदी में उभरे कहानीकारों के बीच अपनी खास पहचान बनाई है। 'पानी' और 'शहतूत' जैसी कहानियों का यह लेखक अपनी रचनाओं के लिए कभी बहुत लम्बा इन्तजार नहीं करवाता। बावजूद इसके, हर बार उसके पास कहने के लिए कोई नई बात होती है; साथ ही, कहने की अलग भंगिमा भी। इस बार मनोज जिस स्वर्णदेश की कहानियाँ सुना रहे हैं, वह उनके अब तक के लेखन से इस मायने में बिलकुल जुदा है कि यहाँ किस्सागोई वाले अन्दाज में एक ऐसा दिक्काल उपस्थित है जो अपनी सूरत में हमारा न होकर भी सीरत में सौ फीसद हमारा है। यह अन्योक्ति वाली युक्ति में गहा हुआ हमारे समय का सार है। पढ़कर हम आश्वस्त होते हैं कि अतीत-प्रेमी राजा ने भले ही स्वर्णदेश की भाषा में घुस आए विजातीय शब्दों की छँटनी करके उसे दिव्यांग बना दिया हो, और लोग कुछ भी बोलने-लिखने में असमर्थ हो चले हों, हमारी भाषा का दमखम अभी बचा हुआ है। यह कथा-शृंखला इसका जिन्दा सबूत है। –संजीव कुमार

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    Manoj Kumar Pandey

    मनोज कुमार पांडेय                    

    7 अक्टूबर, 1977 को इलाहाबाद के एक गाँव सिसवाँ में जन्म। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में परास्नातक। लम्बे समय तक लखनऊ और वर्धा में रहने के बाद आजकल फिर से इलाहाबाद में।

    कहानियों की तीन किताबें शहतूत, पानी और खजाना  प्रकाशित। कई किताबों का सम्‍पादन। देश की अनेक नाट्य संस्थाओं द्वारा कई कहानियों का मंचन। कई कहानियों पर फिल्में भी। अनेक कहानियों का उर्दू, पंजाबी, मराठी, ‌उड़िया, गुजराती, मलयालम तथा अंग्रेजी आदि भाषाओं में अनुवाद। कहानियों के अतिरिक्त कविता और आलोचना में भी रचनात्मक रूप से सक्रिय।

    कहानियों के लिए वनमाली युवा कथा सम्मान, राम आडवाणी पुरस्कार, रवींद्र कालिया स्मृति कथा सम्मान, स्पंदन कृति सम्मान, भारतीय भाषा परिषद का युवा पुरस्कार, मीरा स्मृति पुरस्कार, विजय वर्मा स्मृति सम्मान, प्रबोध मजुमदार स्मृति सम्मान ।

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