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Bela

Bela

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  • Pages: 111p
  • Year: 2017, 2nd Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180319983
  •  
    'बेला' और 'नये पत्ते' के साथ निराला-काव्य का मध्यवर्ती चरण समाप्त होता है । 'बेला' उनका एक विशिष्ट संग्रह है, क्योंकि इसमें सर्वाधिक ताजगी है । अफ़सोस कि निराला-काव्य के प्रेमियों ने भी इसे लक्ष्य नहीं, इसे उनकी एक गौण कृति मान लिया है । 'नये पत्ते' में छायावादी सौंदर्य-लोक का सायास किया गया ध्वंस तो है ही, यथार्थवाद की अत्यंत स्पष्ट चेतना भी है । 'बेला' की रचनाओं की अभिव्यक्तिगत विशेषता यह है कि वे समस्त पदावातली में नहीं रची गयीं, इसलिए 'ठूँठ' होने से बाख गयी हैं । इस संग्रह में बराबर-बराबर गीत और गजलें हैं । दोनों में भरपूर विषय-वैविध्य है, यथा रहस्य, प्रेम, प्रकृति, दार्शनिकता, राष्ट्रीयता आदि । इसकी कुछ ही रचनाओं पर दृष्टिपात करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है । 'रूप की धारा के उस पार/ कभी धंसने भी डोज मुझे?', 'बातें चलीं सारी रात तुम्हारी; आँखे नहीं खुलीं प्राप्त तुम्हारी।', 'लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो /भरा दौंगरा उन्हीं पर गिरा । 'बहार मैं कर दिया गया हूँ । भीतर, पर, भर दिया गया हूँ ।' आदि । राष्ट्रीयता ज्यादातर उनकी गजलों में देखने को मिलती है । निराला की गजलें एक प्रयोग के तहत लिखी गयी हैं। उर्दू शायरी की एक चीज उन्हें बहुत आकर्षित करती थी । वह भी उसमें पूरे वाक्यों का प्रयोग । उन्होंने हिंदी में भी गजलें लिखकर उसे हिंदी कविता में भी लाने के प्रयास किया । निराला-प्रेमियों ने भी उसे एक नक़ल-भर मन और उन्हें असफल गजलकार घोषित कर दिया । सच्चाई यह कि आज हिंदी में जो गजले लिखी जा रही हैं, उनके पुरस्कर्ता भी निराला ही हैं । ये गजलें मुसलसल गजलें हैं । मैं स्थानाभाव में उनकी एक गजल का एक शेर ही उद्धृत कर रहा हूँ : तितलियाँ नाचती उड़ाती रंगों से मुग्ध कर-करके, प्रसूनों पर लचककर बैठती हैं, मन लुभाया है ।

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    Suryakant Tripathi 'Nirala'

    सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

    निराला का जन्म वसन्त पंचमी, 1896 को बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल नामक देशी राज्य में हुआ। निवास उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के गढ़ा कोला गाँव में। शिक्षा हाईस्कूल तक ही हो पाई। हिन्दी, बांग्ला, अंग्रेजी और संस्कृत का ज्ञान आपने अपने अध्यवसाय से स्वतंत्र रूप में अर्जित किया।

    प्राय: 1918 से 1922 ई. तक निराला महिषादल राज्य की सेवा में रहे, उसके बाद से सम्पादन, स्वतंत्र लेखन और अनुवाद-कार्य। 1922-23 ई. में ‘समन्वय’ (कलकत्ता) का सम्पादन। 1923 ई. के अगस्त से ‘मतवाला’—मंडल में। कलकत्ता छोड़ा तो लखनऊ आए, जहाँ गंगा पुस्तकमाला कार्यालय और वहाँ से निकलनेवाली मासिक पत्रिका ‘सुधा’ से 1935 ई. के मध्य तक सम्बद्ध रहे। प्राय: 1940 ई. तक लखनऊ में। 1942-43 ई. से स्थायी रूप से इलाहाबाद में रहकर मृत्यु-पर्यन्त स्वतंत्र लेखन और अनुवाद-कार्य। पहली प्रकाशित कविता : ‘जन्मभूमि’ (‘प्रभा’, मासिक, कानपुर, जून, 1920)। पहली प्रकाशित पुस्तक : ‘अनामिका’ (1923 ई.)।

    प्रमुख कृतियाँ : कविता-संग्रह : आराधना, गीतिका, अपरा, परिमल, गीतगुंज, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, बेला, अर्चना, नए पत्ते, अणिमा, रागविराग, सांध्य काकली, असंकलित रचनाएँ। उपन्यास : बिल्लेसुर बकरिहा, अप्सरा, अलका, कुल्लीभाट, प्रभावती, निरुपमा, चोटी की पकड़, भक्त ध्रुव, भक्त प्रहलाद, महाराणा प्रताप, भीष्म पितामह, चमेली, काले कारनामे, इन्दुलेखा (अपूर्ण)। कहानी-संग्रह : सुकुल की बीवी, लिली, चतुरी चमार, महाभारत, सम्पूर्ण कहानियाँ। निबन्ध-संग्रह : प्रबन्ध प्रतिमा, प्रबन्ध पद्म, चयन, चाबुक, संग्रह। संचयन : दो शरण, निराला संचयन , निराला रचनावली।

    निधन : 15 अक्टूबर, 1961

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