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तुम कभी तारा न बनना, चाहे भगवान कितना ही चमकीला तारा बनावें

कई दिन तक बिंदा के घर झाँक-झाँककर जब मैंने माँ से उसके ससुराल से लौटने के संबंध में प्रश्न किया, तब पता चला कि वह तो अपनी आकाश-वासिनी अम्मा के पास चली गई। उस दिन से मैं प्रायः चमकीले तारे के आस-पास फैले छोटे तारों में बिंदा को ढूँढ़ती रहती; पर इतनी दूर से पहचानना क्या संभव था?

सनीचर के कानों में 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लग रहे थे

राजकमल प्रकाशन के ब्लॉग पर आज पढ़िए श्रीलाल शुक्ल के लोकप्रिय उपन्यास 'राग दरबारी' का यह हिस्सा।

 

Rag Darbari

दुनिया भर में कई तरह के डायसपोरा हैं जिनके बीच में फर्क करना ज़रूरी है

डायसपोरा किसी भी श्रेणी के होंवे एक समान दुविधा में रहते हैं और वह है सांस्कृतिक अस्मिता की दुविधा। 


Diaspora

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