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British Samrajyavad ke Sanskritik Paksha Aur 1857

British Samrajyavad ke Sanskritik Paksha Aur 1857

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  • Pages: 224p
  • Year: 2009
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126717347
  •  
    1857 के डेढ़ सौ वर्ष पूरे हो जाने के उपलक्ष्य में आज इतिहास के इस पड़ाव को सही सन्दर्भों में स्थापित किया जाना नितान्त आवश्यक है। गम्भीरता से जाँचा-परखा जाये तो यह पड़ाव मात्र एक रोमांचकारी अनुभूति देने वाला न होकर हिन्दुस्तान के इतिहास की तमाम ऐसी प्रवृत्तियों का संवर्द्धन करनेवाला और उनका उद्गम स्रोत भी दिखाई देता है जिनका नाता उस उत्तर औपनिवेशिकता से भी बनता दिखता है जिसकी कल्पना बीसवीं शताब्दी के मध्य में आकर ही विश्व के विचारकों द्वारा की जा सकी। सांस्कृतिक साम्राज्यवाद यदि उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही पश्चिमी विश्व की एक सुविचारित विचारधारा का स्वरूप ग्रहण कर चुका था तो उपनिवेशवाद के प्रारम्भिक स्वरूप का गवाह रहा हिन्दुस्तान, और वहाँ सांस्कृतिक दिशा में प्रवृत्त साम्राज्यवादी नीतियों की प्रतिक्रियाएँ भी उसी स्तर के प्रतिरोध पैदा करने में पूर्ण सक्षम थीं। भारत में आने वाले आधुनिक प्रभाव यहाँ की जमीन के लिए सहज तो थे ही नहीं बल्कि कई अर्थों में बिलकुल भिन्न भी थे। फिर ये विचार पश्चिमी आधुनिकता का डंका पीटने वालों और हर अन्य सभ्यता व संस्कृति को हेय दृष्टि से देखने वाले पश्चिम के ईसाई विश्व द्वारा लाए जा रहे थे। किन्तु इस सबके साथ सबसे महत्त्वपूर्ण यह था कि ये उन औपनिवेशिक हुक्मरानों द्वारा लाए जा रहे थे जो इसे जबर्दस्ती लागू करने की मंशा और क्षमता दोनों ही रखते थे। यह परिदृश्य भारत में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को एक तरफ अन्तर्द्वन्द्वों में जकड़ता गया, साथ-साथ उसके इन दंभी हुक्मरानों को अनायास एक अदृष्ट, अप्रत्याशित संकट की ओर भी खींचता चला गया। गहराइयों तक पहुँचकर ही हम वे सारी सम्भावनाएँ तलाश सकते हैं जिन्होंने 1857 के इस पड़ाव को निर्मित किया। एक ऐसा पड़ाव जो युद्ध के रूप में सामने आया, और जिसका नायक एक सिपाही बना। वह सिपाही जो हिन्दुस्तान के आम आदमी, किसान और उच्च जाति, सबका प्रतिनिधि था और अंग्रेज सरकर के कार्यकलापों का साक्षी भी। इस सिपाही के द्वारा किए गए विद्रोह के अर्थ निश्चित रूप से गम्भीर थे।

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    Vandita Verma

    वन्दिता वर्मा

    जन्म: 10 जनवरी, 1953 को जन्म।

    शिक्षा: 1984 मे प्राप्त डी फिल की उपाधि तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षा।

    सद्य उक्त विश्वविद्यालय के आधुनिक इतिहास विभाग में वरिष्ठ उपाचार्य के रूप मे कार्यरत।

    प्रकाशित पुस्तक: फाम मार्कसिज्म टु डेमोक्रेटिक सोशलिज्म नाम से 2005 मे अंग्रेजी में।

    हिन्दी के ख्यातिनाम साहित्यकार स्व., केशवचंद्र वर्मा की पुत्री।

    सम्पर्क: बी 6 अग्निपथ अपार्टमेंट, तेज बहादुर सप्रू मार्ग, सिविल लाइन्स, इलाहाबाद।

    ई-मेल: anupam5ald@dataone.in

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