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Char Din Ki Jawani Teri

Char Din Ki Jawani Teri

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  • Pages: 108p
  • Year: 2019, 5th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788171197187
  •  
    तेजी से सिकुड़ती इस दुनिया में पिछड़ा भारत 'नयेपन' के ओले सह रहा है । नयापन का दायरा तकनीक, पद्धति, वस्तु से लेकर विचार तक फैला है । नये वाद के आगमन के साथ पुराने वादों के अंत की घोषणाओं में कथा के अंत की घोषणा शामिल है । साहित्य अकबकाया दीखता है । लेकिन इस संकलन की कहानियाँ अपनी जमीन में जड़ों को पसारती, तने को ठसके से खड़ा रखे हुए दीखती हैं क्योंकि उसे भरोसा है अपनी कथा में सिक्त पूर्वी तर्ज का । उनमें पहाड़ का दरकता जीवन अपने रूढ़ विश्वासों और गतिशीलता, दोनों के साथ दीखता है । कहानियों में जीवन की स्थितियाँ और चरित्र दोनों महत्त्व पाते हैं । इनमें हिर्दा मेयो जैसा अनूठा चरित्र भी है । उसकी हँसी में ऐसा रूदन छिपा है जो सीधे पहाड़ की दरकती छाती से फूटता रहता है फिर भी अपनी अस्मिता पहाड़ में ही तलाशता है । मंत्र से बवासीर ठीक कर लेने का भ्रम पालने वाले हरूचा के साथ विदेश में जा बसे मुन्‍नू चा जैसे चरित्र भी हैं । विकास के नाम पर पहाड़ की संजीवनी सोख लेने वाली शक्तियाँ हैं । प्रकृति के आदिम प्रजनन कृषि पर पड़ती परायी छाया की दारुण कथा 'बीज' में है । जहाँ हिर्दा मेयो में पहाड़ का धीरज है वहीं उसके मँझले बेटे में पहाड़ का गुस्सा भी है । इन कहानियों में आत्म-विश्वास से भरा खुलापन है जो परंपरा की मिट्टी पर प्रयोग करता चलता है । कथा-रस से भरपूर इन कहानियों में विवरण की भव्यता के साथ-साथ चरित्र-चित्रण की विरल कुशलता भी लक्षित होती है । भाषा में लचीलापन के साथ कविता-सी खुशबू भी है । परंपरा के संग चलती प्रयोगशीलता भी है । देसज मिट्टी से फूटी आधुनिकता प्रयोग के लिए परायों का मुँह नहीं जोहती बल्कि स्वयं नया रूप रचती है । यह मृणाल पांडे का चौथा संकलन है जो नया तो है ही, प्रौढ़ भी है । इसीलिए इसकी रचनात्मकता की प्रतिध्वनियाँ भविष्य में भी सुनी जाएँगी । अरुण प्रकाश

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    Mrinal Pandey

    मृणाल पाण्डे

    मृणाल पाण्डे का जन्म 26 फरवरी, 1964 को मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में हुआ। प्रयाग विश्वविद्यालय, इलाहाबाद से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. और गन्धर्व महाविद्यालय से ‘संगीत विशारद’  के अलावा आपने कॉरकोरन स्कूल ऑफ आर्ट, वाशिंगटन में चित्रकला एवं डिजाइन का विधिवत् अध्ययन किया।

    कई वर्र्षों तक विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्यापन के बाद पत्रकारिता के क्षेत्र में आईं। साप्ताहिक हिन्दुस्तान, वामा तथा दैनिक हिन्दुस्तान के बतौर सम्पादक समय-समय पर कार्य किया। स्टार न्यूज़ और दूरदर्शन के लिए हिन्दी समाचार बुलेटिन का सम्पादन किया। तदुपरान्त प्रधान सम्पादक के रूप में दैनिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी एवं नन्दन  से जुड़ीं। वर्ष 2010 से 2014 तक प्रसार भारती की  चेयरमैन भी रहीं।

    प्रकाशित पुस्तकें : सहेला रे, विरुद्ध, पटरंगपुर पुराण, देवी, हमका दियो परदेस, अपनी गवाही (उपन्यास); दरम्यान, शब्दवेधी, एक नीच ट्रैजिडी, एक स्त्री का विदागीत, यानी कि एक बात थी, बचुली चौकीदारिन की कढ़ी, चार दिन की जवानी तेरी (कहानी-संग्रह); ध्वनियों के आलोक में स्त्री (संगीत); मौजूदा हालात को देखते हुए, जो राम रचि राखा, आदमी जो मछुआरा नहीं था, चोर निकल के भागा, सम्पूर्ण नाटक और देवकीनन्दन खत्री के उपन्यास काजर की कोठरी  का इसी नाम से नाट्य-रूपान्तरण (नाटक); स्त्री : देह की राजनीति से देश की राजनीति तक, स्त्री : लम्बा सफर (निबन्ध); बन्द गलियों के विरुद्ध (सम्पादन);

    ओ उब्बीरी (स्वास्थ्य); मराठी की अमर कृति मांझा प्रवास : उन्नीसवीं सदी  तथा अमृतलाल नागर की हिन्दी कृति गदर के फूल  का अंग्रेजी में अनुवाद।

    अंग्रेज़ी : द सब्जेक्ट इज वूमन (महिला-विषयक लेखों का संकलन), द डॉटर्स डॉटर, माइ ओन विटनेस (उपन्यास), देवी (उपन्यास-रिपोर्ताज), स्टेपिंग आउट : लाइफ एंड सेक्सुअलिटी इन रुरल इंडिया।

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