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Chhayavad Ka Saundraya Shashtriya Adhyayan

Chhayavad Ka Saundraya Shashtriya Adhyayan

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Special Price Rs. 180

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  • Pages: 263p
  • Year: 1996
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: CKSS76
  •  
    छायावाद का सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन इस ग्रन्थ में सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन को एक नयी दिशा दी गयी है । अब तक हीगेल और क्रोचे जैसे प्रमुख पाश्चात्य विचारकों से लेकर दासगुप्त, मर्ढेकर और बारलिंगे जैसे भारतीय अध्येताओं तक ने सौन्दर्यशास्त्र का जो सैद्धान्तिक निरूपण किया था, उसे अग्रसर करते हुए इस 'प्रस्थान-ग्रन्थ' में सौन्दर्यशास्त्र को काव्यानुशीलन की दृष्टि से व्याव- हारिक आलोचना के धरातल पर उतारा गया है । प्रस्तुत पुस्तक का ऐतिहासिक महत्व यह है कि इसके द्वारा पहली बार हिन्दी आलोचना-साहित्य में सौन्दर्यशास्त्रीय या कलाशास्त्रीय मान्यताओं के साहाय्य से निष्‍पन्‍न एक अद्यतन काव्यशास्त्र को उपस्थित किया गया है और उसके निकष पर छायावादी कविता के कलात्मक सौष्ठव का सटीक मूल्यांकन किया गया है । हिन्दी साहित्य में व्यावहारिक आलोचना के धरातल पर अवतरित सौन्दर्यशास्त्र-विषयक यह पहला ग्रन्थ है, जिसके अन्तर्गत छायावादी कविता में न्यस्त सौन्दर्य, कल्पना, बिम्ब और प्रतीक जैसे प्रमुख कला-तत्वों का इतना सांगोपांग तथा प्रामा- पिक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है । विद्वान् लेखक ने इस ग्रन्थ के माध्यम से पारम्परिक काव्यशास्त्र और आधुनिक आलोचना को एक व्यवस्थित सौन्दर्य- शास्त्रीय आधार प्रदान कर ऐतिहासिक महत्व का -पार्थ किया है ।

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    Dr. Kumar Vimal

    साहित्यिक जीवन का प्रारंभ काव्य-रचना से हुआ। किंतु, क्रमशः आलोचना में प्रवृत्ति रम गई। 1949 से ही हिंदी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, आलोचनात्मक निबंधादि प्रकाशित हो रहे हैं।

    पटना विश्वविद्यालय से 1954 ई. में एम.ए. (हिंदी) और 1964 ई. में डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की। संप्रति बिहार लोक सेवा आयोग के सम्मानित सदस्य हैं। इसके पूर्व बिहार राष्ट्रभाषा-परिषद्, पटना के निदेशक-पद पर कार्य कर चुके हैं। इन्होंने बिहार सरकार द्वारा स्थापित साहित्यकार कलाकार-कल्याण कोष-परिषद् के आद्य सचिव के रूप में बिहार के अनेक साहित्यकारों और कलाकारों की उल्लेखनीय सेवा की है। अध्यापन के प्रति इन्हें सहज अनुराग है। ये पटना विश्वविद्यालय में कई वर्षों तक हिंदी के अध्यापक रह चुके हैं।

    सन् 1973 ई. में इन्होंने राजकीय अतिथि के रूप में जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया और सोवियत रूस की सांस्कृतिक यात्रा की है तथा यूरोप के अन्य कई देशों का भ्रमण किया है। इनकी आलोचनात्मक कृतियाँ पुरस्कार-योजना समिति, उत्तर प्रदेश, बिहार राष्ट्रभाषा-परिषद् तथा हरजीमल डालमिया पुरस्कार समिति, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत हो

    चुकी हैं।

    अब तक आठ आलोचना-ग्रंथ, दो संपादित पुस्तकें और तीन कविता-संग्रह प्रकाशित।

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