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Media Kaleen Hindi : Swaroop Aur Sambhavnaen

Media Kaleen Hindi : Swaroop Aur Sambhavnaen

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  • Pages: 203p
  • Year: 2005
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171199135
  •  
    वर्तमान काल मीडिया का काल है। मीडिया की ताकत का लोहा न माननेवाला शायद ही कोई दिखाई दे। जिस तरह मीडिया में माहौल और व्यवस्था को बनाने की ताकत होती है उसी तरह बिगाड़ने की भी। मीडिया को लेकर इस ग्रंथ के लेखक की मान्यता है कि ‘यह वह अद्भुत आग है जो जीवन देती भी है और लेती भी, हँसाती भी है और रुलाती भी, बनाती भी है और बिगाड़ती भी’। लेकिन सकारात्मक सोच से कहना होगा कि मीडिया वह साधन है जिसका प्रयोग मानव जाति के कल्याण के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है। वर्तमान काल का भयावह सच है बेरोजगारी। लेकिन ऐसे माहौल में मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने रोजगार के अनेक अवसर प्रदान किए हैं, इसे भी नकारा नहीं जा सकता। सच तो यह है कि आई.टी. के इस उन्नत माहौल में रोजगार के सबसे ज्यादा अवसर भाषा के अध्येता के लिए हैं। भारत के संदर्भ में हिंदी जैसी भाषा के अध्येता के लिए मीडिया के बूते पर रोजगार की अनेक संभावनाएँ दावत दे रही हैं। युवा पीढ़ी की स्थिति और गति को जाननेवाले युवा समीक्षक डॉ. अर्जुन चव्हाण ने युग की माँग को देखते हुए प्रस्तुत रचना का लेखन किया है। उनकी समीक्षा खोखले आडंबर एवं पाखंड पर जितनी क्षमता से प्रहार करती है उतनी ही क्षमता से नई पीढ़ी को चुनौतियों का सामना करने की दृष्टि भी प्रदान करती है। दस अध्यायों में विभाजित इस रचना में अद्यतन विषय पर प्रकाश डाला है। विशेषतः वैश्वीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी, संचार माध्यम का हिंदी परिप्रेक्ष्य, हिंदी के बूते पर रोजगार के अवसर तथा संगणकीय हिंदी जैसे विषय पर लेखन होना समकालीन समय और युग की माँग थी। आधुनिक हिंदी साहित्य के अलावा हिंदी भाषा का प्रयोजनपरक पक्ष भी जिनके अध्ययन, अनुसंधान और समीक्षा का विषय बना है वे बेलाग समीक्षक डॉ. अर्जुन चव्हाण इस ग्रंथ के जरिए न केवल हिंदी समीक्षा को समृद्ध करते हैं बल्कि अपने काल की चुनौतियों का सामना करने का ‘क्ल्यू’ भी देते हैं। प्रस्तुत रचना भाषा के अध्येताओं के भीषण वर्तमान को बेहतर भविष्य में बदलने के लिए दृष्टि और दिशा भी दे सकती है, इसमें संदेह नहीं।

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    Arjun Chauhan

    जन्म: पारेवाडी, ता. परांडा, उस्मानाबाद (महा.)। शिक्षा: एम.ए., बी.एड., पी-एच.डी. (हिंदी)। कर्मभूमि: सांगली, शाहूवाडी- सरूड, इस्लामपुर, कराड एवं कोल्हापुर।

    ग्रंथ लेखन :  उपन्यासकार  राजेन्द्र  यादव,  अनुवाद  चिंतन, अनुवाद: समस्याएँ एवं समाधान, राजेन्द्र यादव के उपन्यासों में मध्यवर्गीय जीवन, हिंदी साहित्य: हाशिए के विमर्श (शीघ्र प्रकाश्य), जरा याद करो कुर्बानी (निबंध-संग्रह), जय बोलने वाले (काव्य-संग्रह), परसाई के साहित्य का परि: श्य (यंत्रस्थ), बीसवीं सदी के अंतिम दशक के उपन्यास: परिवेश और परिप्रेक्ष्य (शीघ्र प्रकाश्य), आधुनिक हिंदी कालजयी साहित्य (संपादन), गद्य-पद्य की बारह पाठ्य-पुस्तकों का संपादन।

    अनुवाद: ‘डेराडंगर’ दादासाहब मोरे की मराठी आत्मकथा ‘गबाल’ का हिंदी अनुवाद, अनेक रचनाओं के लेखों के अनुवाद, ‘क्षितिज-स्पर्श’ वि.स. खांडेकर की मराठी कहानियों का हिंदी अनुवाद (शीघ्र प्रकाश्य)।

    विस्तार कार्य: सदस्य, महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी, मुंबई (2002-2005); सदस्य, सलाहकार समिति, केन्द्रीय सचिवालय हिंदी परिषद, नई दिल्ली (2001-2003); आजीवन सदस्य, भारतीय हिंदी परिषद; प्रधान सचिव, महाराष्ट्र हिंदी परिषद (1993-2000)।

    पुरस्कार व सम्मान: महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार (सन् 1998); दस दिवसीय सहस्राब्दी विश्व हिंदी सम्मेलन, नई दिल्ली की ओर से ‘राष्ट्रीय हिंदी सेवी सहस्राब्दी सम्मान’ से विभूषित (सन् 2000); क्रीड़ा मंत्रालय भारत सरकार द्वारा संचालित नेहरू युवा केन्द्र, कोल्हापुर की ओर से ‘युवा प्रेरक मार्गदर्शक’ सम्मान (जनवरी, 2001); मानव संसाधन विकास मंत्रालय (भारत सरकार) से संलग्न केंद्रीय हिंदी निदेशालय नई दिल्ली की ओर से अहिंदीभाषी हिंदी लेखक - राष्ट्रीय पुरस्कार (जनवरी 2002)।

    संयोजन परियोजनाएँ: राज्य  एवं  राष्ट्रीय  स्तर  की  अनेक संगोष्ठियों / कार्यशालाओं के कुशल संयोजक; यू.जी.सी. नई दिल्ली  की  ओर  से  अनुदानित  ‘अनुवाद :  स्वरूप  एवं समस्याएँ’ - विषयक लघु शोध परियोजना को सफलता से सम्पन्न किया; यू.जी.सी. नई दिल्ली की ओर से ‘समकालीन हिंदी एवं मराठी - बृहत उपन्यासों का वैचारिक पक्ष: तुलनात्मक विमर्श’ विषयक बृहत् शोध परियोजना को अनुदान प्राप्त (जुलाई 2003 से जून 2006 तक)।

    प्रशासकीय दायित्व :  अध्यक्ष,  हिंदी  विभाग,  शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर - जून 2003 से मई 2003 तक।

    संप्रति: प्रपाठक, हिंदी विभाग, शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर।

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