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Devraat

Devraat

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  • Pages: 96p
  • Year: 1992
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 817119060x
  •  
    देवरात 'देवरात' आत्मकथन शैली मे रचित खण्ड-काव्य है । वैदिक काल के इस आख्यान का मूल विचार आधु- निक संदर्भों में सटीक प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें नरबलि और दास प्रथा, दमन-चक्र तथा शोषण पर प्रहार किया गया है । इक्ष्वाकु वंश के राजा हरिश्चन्द्र कथ्य के केन्द्र में है । अत: कवि ने उन्हीं के मुख से कथा कहलाई है । अपने आप से बात करते चले जाने वाला यह रचना- रूप अपने आप में विशिष्ट तो है ही, बल्कि राजा हरिश्चन्द्र की व्यथा और उनसे जुड़े त्रासद प्रसंग को बड़े मार्मिक ढंग से रेखांकित करता है । यथार्थवादी दृष्टि से देखें तो 'देवरात' सामन्ती युग की तमाम विसंगतियों पर दृष्टिपात करते हुए 'सामाजिक सत्य' का संदेश है । कवि स्वयं आर्थिक तथा आत्मिक साम्य के आधार पर गठित मानव समाज को सर्वोपरि मानते हैं और समाज के बारे में उनका यही सत्य इस खण्ड-काव्य में उद्‌घाटित हुआ हे । खण्ड-काव्य में कथा-प्रवाह अपनी समग्रता में बेहद प्रभावित करता है ।

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    Vishnu Dutt Rakesh

    डॉ. विष्णुदत्त राकेश

    जन्म:  8 मार्च, 1941; उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर का किनौनी गाँव।

    शिक्षा: उच्च शिक्षा देहरादून तथा संस्कृत शास्त्रों का अध्ययन वाराणसी में। एम.ए., पी-एच.डी., डी.लिट्।

    विशेषज्ञता: हिन्दी, संस्कृत साहित्य तथा पुरा विद्याओं के पंडित। कवि-समीक्षक।

    सम्प्रति: गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार में हिंदी विभाग में आचार्य एवं अध्यक्ष पद पर कार्यरत।

    प्रकाशन: ‘तुलनात्मक साहित्य शास्त्र’, ‘हिंदी साहित्य का मध्यकाल’, ‘कुलपति मिश्र’, ‘उत्तर भारत के निर्गुण पंथ साहित्य का इतिहास’, ‘रीतिकाल के ध्वनिवादी हिंदी आचार्यों का तुलनात्मक अध्ययन’, ‘पंत का सत्यकाम’, ‘दश महाविद्या मीमांसा’, ‘वैदिक साहित्य, संस्कृति और समाजदर्शन’, ‘आचार्य किशोरीदास वाजपेयी और हिंदी शब्द-शास्त्र’, ‘आधुनिक हिंदी लेखन की ऊर्जा’ आदि।

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