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Dhamam Sharanam

Dhamam Sharanam

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  • Pages: 235p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126706538
  •  
    धर्म यदि राजनीति को नियंत्रित-निर्देशित करने लगे अथवा राजनीति ही धर्म की आड़ में अपना खेल खेलने लगे तो हिंसा निश्चय ही उसका अनिवार्य परिणाम होगी। नई पीढ़ी के सुपरिचित कथाकार सुरेश कांत ने इस उपन्यास के माध्यम से इसी सत्य को रेखांकित किया है। इसके लिए लेखक ने प्रियदर्शी अशोक की मृत्यु (ई.पू. 236) के करीब सौ वर्ष बाद का समय चुना है, जबकि संपूर्ण उत्तर-पश्चिमी भारत यूनानी आक्रमणों का शिकार था और मगध साम्राज्य का महान सेनानी पुष्यमित्र मौर्यवंश के अस्तप्राय गौरव की पुनर्स्थापना में लगा हुआ था, जैन धर्म का अभी प्रादुर्भाव ही हुआ था और पतनशीलता के गर्त में पड़ा हुआ बौद्ध धर्म अहिंसा के नाम पर अपनी सर्वाधिक हिंसक एवं राष्ट्रविरोधी भूमिका में था। इस पृष्ठभूमि में लेखक ने धर्म और राजनीति के अंतर्संबंधों का गंभीर विवेचन किया है और राष्ट्रीय स्वाभिमान के संदर्भ में हिंसा तथा अहिंसा की सार्थकता का सवाल उठाया है। उसके पास इतिहास को देखने की एक लोकोन्मुख दृष्टि है और उसे एक रोचक कथा-फलक प्रदान करने की रचनात्मक क्षमता भी। वस्तुतः लेखक की यह ऐतिहासिक कथाकृति तथाकथित ‘धर्म’ के उस भयावह चेहरे को उघाड़ती है, जो प्रायः अनदेखा रह जाता है और यह कार्य उसने कुछ इस कुशलता से किया है कि वर्तमान भारत में राजनीति करनेवाली धर्मोन्मादी शक्तियाँ - मठ और मंदिर - अनायास हमारे सामने नग्न हो उठती हैं। हम उन धर्म-स्थानों और धर्म-गुरुओं को पहचान जाते हैं, जो जेतवन-विहार के विशाल चैत्य और संघ-स्थविर मोग्गलान-जैसे लोगों की शक्ल में यहाँ आज भी सक्रिय हैं। कहना न होगा कि इस कृति में रूपायित अतीत हमारे वर्तमान का ही एक चिंतनीय अध्याय है।

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    Suresh Kant

    चर्चित हिंदी-लेखक सुरेश कांत ने प्रायः सभी विधाओं में अपनी 25 से भी अधिक कृतियों द्वारा हिंदी-साहित्य को एक नई ताजगी दी है। उनकी अनेक कृतियाँ साहित्य कला परिषद (दिल्ली), हिंदी अकादमी (दिल्ली), उ.प्र. हिंदी संस्थान (लखनऊ) आदि द्वारा पुरस्कृत की जा चुकी हैं। उनके नुक्कड़ व्यंग्य-नाटक ‘विदेशी आया’ के 100 से भी ज्यादा प्रदर्शन हो चुके हैं। दैनिक ‘अमर उजाला कारोबार’ में हर रविवार को प्रकाशित होने वाला उनका साप्ताहिक व्यंग्य-कॉलम ‘अर्थसत्य’ और हर मंगलवार को प्रकाशित होने वाला उनका साप्ताहिक प्रबंधन-कॉलम बहुत चर्चित हुए हैं। उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ इस प्रकार हैं:

    व्यंग्य: ब से बैंक (पुरस्कृत), अफसर गए विदेश (पुरस्कृत), पड़ोसियों का दर्द, बलिहारी गुरु (पुरस्कृत), अर्थसत्य।

    उपन्यास: धम्मं शरणम् (पुरस्कृत), युद्ध, जीनियस, नवाब साहब, कनीज।

    कहानी: उत्तराधिकारी, गिद्ध, क्या आप एस.पी. दीक्षित को जानते हैं ?

    नाटक: रजिया, प्रतिशोध, विदेशी आया, गवाही, कौन ?

    बाल-साहित्य: कुट्टी, रोटी कौन खाएगा, चलो चाँद पर घूमें, भाषण बाबू, भैंस का अंडा, विश्वप्रसिद्ध बाल कहानियाँ (पाँच भाग)।

    अन्य: प्रबंधन के गुरुमंत्र, कुशल प्रबंधन के सूत्र, बैंकों में हिंदी का प्रयोग, इन्साइक्लोपीडिक डिक्शनरी ऑफ बैंकिंग एंड रिलेटिड टर्म्स (शीघ्र प्रकाश्य) आदि।

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