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Do Akalgadh

Do Akalgadh

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  • Pages: 448p
  • Year: 2013, 4th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180317392
  •  
    पंजाब के जन-जीवन का जैसा जीवन्त चित्रण श्री बलवन्त सिंह ने किया है, वैसा हिन्दी के अन्य किसी भी लेखक ने नहीं किया है—विशेष रूप से पंजाब के सिखों के जीवन का। उनका पौरुष, शौर्य, स्वाभिमान शेखों और सौन्दर्यप्रियता के साथ-साथ उनकी ‘रफनेस’ और ‘रगेडनेस’ को भी बलवन्त सिंह ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में बड़े ही कलात्मक ढंग से अभिव्यक्त किया है। श्री बलवन्त सिंह का यह उपन्यास ‘दो अकालगढ़’ तो सिख-जीवन का एक महाकाव्य ही कहा जा सकता है। जीवन की उत्तप्तता से ओत-प्रोत सिखों के लिए किसी-न-किसी चुनौती का होना एक अनिवार्यता-जैसी है। जीवन के सद्-असद् पक्ष सदा उनके लिए चुनौतियाँ प्रस्तुत करते रहे हैं। ‘दो अकालगढ़’ की पृष्ठभूमि का निर्माण करनेवाले ‘उच्चा अकालगढ़’ और ‘नीवाँ अकालगढ़’ सिखों की ऐसी ही दो चुनौतियों के प्रतीक हैं। उपन्यास का नायक दीदारिंसह ऐसी ही चुनौती को सरे-मैदान उछालकर अपनी छवी की नोक पर रोक लेने को आकुल रहता है। अल्हड़ साँड़नी पर सवार होकर वह डाके डालने, मेले घूमने, अपने मित्र की खातिर उसकी प्रेमिका का अपहरण करने तथा खूऩखराबा करने में ही व्यस्त नहीं रहता, बल्कि उसके विशाल, पुष्ट और माइयों, सोहनियों और हीरों को लुभा लेनेवाले आकर्षक शरीर में एक प्रेमी का नाजुक दिल भी है। अपने खानदान के परम शत्रु सरदार गुलजारािंसह की अत्यन्त सुन्दर कन्या ‘रूपी’ को जिस कोमलता से वह उठाकर घोड़े पर सवार कर लेता है, उसे कोई देख पाता तो कहता कि हाय! यह हाथ तो बस फूल ही चुुनने के लिए है, भला इन्हें छवियाँ चलाने से क्या काम! पंजाब के जीवन की ऐसी चटख और मद्धम रगोरंग को गुलकारी केवल बलवन्त सिंह में ही पायी जाती है।

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    Balwant Singh

    जन्म : 1925,  गुजराँवाला, पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) ।

    शिक्षा : इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक।

    हिंदी कथा-साहित्य में अकेले ऐसे कृतिकार जिन्होंने पंजाब के ऐतिहासिक काल से लेकर आधुनिक मनोभूमि के विराट चित्र अपनी कृतियों में प्रस्तुत किए हैं। इनकी कितनी ही औपन्यासिक कृतियों को महाकाव्य कहा जा सकता है। जनजीवन के सामाजिक यथार्थ की ऐसी विश्वसनीयता हिंदी साहित्य में प्रायः विरल है। परिवेश ऐतिहासिक हो या समसामयिक - उनकी रचनाओं में संवेदना का तरल प्रवाह विद्यमान है । 12-13 वर्ष की आयु में पहली गद्य रचना । 1964 तक व्यवसाय।

    प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें : रात चोर और चाँद, काले कोस, रावी पार, सूना आसमान, साहिबे-आलम, राका की मंज़िल, चकपीराँ का जस्सा, दो अकालगढ़, एक मामूली लड़की, औरत और आबशार, आग की कलियाँ, बासी फूल (उपन्यास); पहला पत्थर, चिलमन, मेरी प्रिय कहानियाँ, प्रतिनिधि कहानियाँ (कहानियाँ); अमृता प्रीतम (आलोचना)।

    निधन: 27 मई, 1986

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