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Ekant Ke Sau Varsh

Ekant Ke Sau Varsh

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  • Pages: 375p
  • Year: 2007
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126707522
  •  
    एकान्त के सौ वर्ष ऐसा उपन्यास है जो विभिन्न आयामों के बीच एक द्वंद्वात्मक खिंचाव बनाए रखता है। सर्वप्रथम तो यह एक हास्य उपन्यास है, संपूर्ण मनोरंजन, जो साहित्य के प्रति इस अवमाननाकारी रुख को लेकर चलता है कि साहित्य एक उम्दा खिलौना है, उसे गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। लेकिन साथ ही, यह एक बेहद संजीदा और महत्त्वाकांक्षी पुस्तक भी है जो एक ओर लैटिन अमेरिका के इतिहास के पुनर्लेखन का बीड़ा उठाती है तो दूसरी ओर अन्त में पाठक को आगाह कर देती है कि उपन्यास महज एक कल्पित संरचना है, एक सृजन, एक आईना नहीं जो वास्तविकता को बारीकी से प्रतिबिम्बित करता हो। वास्तविकता को समझने और उसका वर्णन कर पाने की मनुष्य की क्षमता पर परम्परागत यथार्थवादी लेखन के भरोसे को स्वीकारने में असमर्थ, मार्केज़ ने एक ऐसी शैली अपनाई जो यथार्थवादी उपन्यासों की दस्तावेज़ी विधि से हटकर थी और जिसे ‘मैजिकल रीयलिज़्म’ यानी ‘जादुई यथार्थवाद’ का नाम दिया गया। यह समझ लेना ज़रूरी है कि एकान्त के सौ वर्ष का तथाकथित जादुई यथार्थवाद यह नहीं जतलाता कि लैटिन अमेरिकी वास्तविकता का नैसर्गिक चरित्र ही जादुई है। यद्यपि उपन्यास वहाँ के प्राकृतिक माहौल के अपूर्व आयामों और राजनैतिक जनजीवन की अतिशयोक्तियों का खुलासा अवश्य करता है। ‘अतिकल्पना’ के प्रयोग के विषय में भी कहना होगा कि एकान्त के सौ वर्ष में यह पूरी तरह से लागू नहीं होता क्योंकि प्रत्येक वर्णित घटना का, चाहे वह कितनी भी अद्भुत क्यों न हो, एक नितान्त तर्कसंगत स्पष्टीकरण भी है। उपन्यास में घटनाएँ जब प्रस्तुत की जाती हैं तो वैसे नहीं जैसी वे वास्तव में घटित हुईं, बल्कि जैसे वहाँ के लोगों ने उन्हें अनुभव किया और समझा। इसी प्रकार अतिशयोक्तियों का प्रयोग भी, उदाहरण के लिए खोसे आर्कादियो की विलक्षण वीर्यवत्ता, कर्नल औरेलियानो बुएनदीया के बत्तीस सशस्त्र विद्रोह, बहत्तर चिलमचियाँ खाली करने के लिए कतार में खड़ीं बहत्तर बालिकाएँ - सब उस विधि के अनुरूप है जिसके चलते लोक-स्मृति आम घटनाओं को बढ़ा-चढ़ा देती है। वास्तव में एकान्त के सौ वर्ष माकोन्दो के इतिहास को उसी रूप में पेश करता है जैसा कि वह मौखिक लोक-परम्परा में दर्ज हुआ और पीढ़ी-दर-पीढ़ी याद किया गया।

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    Gabriel Garcia Marquez

    1928 में जन्मे गाब्रिएल गार्सीया मार्केज़ ने अपने बाल्यकाल के निर्णायक वर्ष कोलोम्बिया के उत्तरी तट के उष्ण प्रदेशीय कैरिबी क्षेत्र में अराकाताका नामक एक छोटे से शहर में बिताए।

    1955 में एल एस्पेक्तादोर ने मार्केज़ को विदेशी संवाददाता की हैसियत से यूरोप भेजा किन्तु पेरिस पहुँचने के कुछ ही बाद उन्हें पता चला कि सरकार ने अखबार बंद करवा दिया है। कई महीनों तक कठिनाई और मुसीबतों का सामना करने के बाद, 1957 में वे वेनेजुएला की राजधानी काराकास पहुँचे और वहाँ लगभग दो साल पत्रकारिता की। 1959 में क्यूबन क्रांति के बाद उन्होंने क्यूबन समाचार एजेंसी प्रेन्सा लातीना में काम शुरू किया, पहले बोगोता और फिर क्यूबा व न्यूयॉर्क में। 1958 में विवाह हुआ और 1961 में वे मेक्सिको सिटी पहुँचे जहाँ पत्रकारिता के साथ-साथ फिल्मी पटकथाएँ लिखीं।

    रचनाएँ: एल कोरोनेल नो तिएने किएन ले एस्क्रीबा, ला माला ओरा, लोस फूनेरालेस दे मामा ग्रान्दे, सिएन आन्योस दे सोलेदाद, ला इन्क्रेईब्ले इ त्रीस्ते इस्तोरिया दे ला कांदिदा ब्रेन्दिरा इ दे सू आबुएला देसाल्मादा, एल ओतोन्यो देल पात्रियार्का, क्रोनिका दे ऊना मुएर्ते आनुन्सियादा, आमोर एन लोस तिएम्पोस दे कोलेरा, एल खेनेराल एन सू लाबेरिन्तो, दे आमोर इ ओमोस देमोनियोस, इत्यादि। हाल ही में उनके संस्मरणों का पहला खण्ड प्रकाशित हुआ है: विवीर पारा कोन्तारला (2003)।

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