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Ga Hamari Zindagi Kuchha Ga

Ga Hamari Zindagi Kuchha Ga

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  • Pages: 95p
  • Year: 2011
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126720309
  •  
    इस संग्रह में संकलित रचनाओं को पढ़ते हुए लक्षित किया जा सकता है कि ये ‘ग्राम-अभ्युदय’ की कामनाओं से जुड़ी हैं। गाँधीजी ने जिस आख़िरी आदमी के आशीर्वाद की कामना और जिस आदमी के लिए ‘स्वराज्य’ की बात की थी, ग्राम-अभ्युदय का सरोकार उससे था। अंग्रेजों ने इसी आदमी को गरिमाविहीन कर दिया था। राष्ट्रनेताओं ने इसी के अर्ध-नग्न शरीर के लिए सूत काता था। मैथिलीशरण गुप्त ने उल्लसित होकर कहा थादृ‘अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है’ और पन्त ने असीम अनुराग के साथ लिखादृ‘भारत माता ग्रामवासिनी’। ये वे दिन हैं जब ‘गाँव और किसान’ अर्थशास्त्र के केन्द्र में था। इन दिनों की तरह संवेदनाहीन ‘आत्म-हत्याओं’ की चर्चा के केन्द्र में नहीं। इन गीतों में उस चिरन्तन आशावाद से रचा-बुना सपना है जो सब समतावादियों और उनके शुभचिंतकों का रहा है। अभिधाप्रधान गीतों में उस नए समाज, नई संस्कृति, समय के सुदिनों की भविष्यवाणी भी है जिससे राजस्थान में व्यापक जनाधार के लिए लेखन शुरू होता है। कुछ गीतों, चतुष्पदियों में प्रेम की उदास विफलताओं का विषाद भी हैदृ‘आज यूँ लगा कि दे न कुछ सका, और यूँ कि शेष कुछ न पास है’ लेकिन इस विषाद की परतों को उधेड़ती बसन्त की नई कांेपल की तरह यह सुखद प्रतिज्ञा याद आ जाती है ‘मैं कहाँ भूला कि लाना है मुझे नव प्रात’। ‘नया’ इन कविताओं का बीज शब्द है जो बार-बार आता है। स्वयं कवि के शब्दों मेंदृ‘नया शब्द मेरे लिए औपनिवेशिक दासता से मुक्ति का प्रतीक था...। मेरे लिए नए का अर्थ था शोषण-मुक्त व्यवस्था, सामंतों के उत्पीड़न से छुट्टी, प्रेम करने की आजादी, लोकतंत्र, इत्यादि।’ इसी नए का आह्वान करती ये कविताएँ काव्य-प्रेमी पाठकों को एक विशिष्ट आस्वाद से परिचित कराएँगी।

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    Nand Chaturvedi

    नन्द चतुर्वेदी

    जन्म : 21 अप्रैल, 1923 को रावजी का पीपत्या (पहले राजस्थान में अब मध्य प्रदेश में)।

    शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी), बी.टी.।

    कर्म-क्षेत्र : 1950 से 1955 तक गोविन्दराम सेकसरिया टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में प्राध्यापक; 1956 से 1981 तक विद्याभवन रूरल इंस्टीट्यूट में हिन्दी प्राध्यापक।

    लेखन : ब्रजभाषा में कविता लिखना प्रारम्भ किया। कविता के लिए पहला पुरस्कार बारह वर्ष की आयु में। राष्ट्र की स्वाधीनता और सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरियों को रेखांकित करते हुए घनाक्षरी, सवैया, पद, दोहा पदों में रचनाएँ। हिन्दी (खड़ी बोली) में चतुष्पदियों, गीत से लगाकर अतुकान्त-आधुनिक कविताओं का सृजन। 'सप्तकिरण’, 'राजस्थान के कवि’ (भाग 1), 'इस बार’ (अध्यापकों का कविता संग्रह), 'जयहिन्द’ (समाजवादी साप्ताहिक) से लेकर 'जनमन’, 'जन-शिक्षण’, 'मधुमती’ तथा चिन्तन-प्रधान साहित्यिक पत्रिका 'बिन्दु’ का सम्पादन। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की उच्च कक्षाओं के लिए कहानी तथा गद्य की अन्य विधाओं का संग्रह सम्पादन। राजस्थान साहित्य अकादमी के लिए प्रान्त के प्रख्यात रचनाकारों पर 'मोनोग्राफ’ लेखन।

    प्रकाशित कृतियाँ : गा हमारी जिन्दगी कुछ गा, उत्सव का निर्मम समय, जहाँ उजाले की एक रेखा खींची है, यह समय मामूली नहीं, ईमानदार दुनिया के लिए, वे सोये तो नहीं होंगे (कविता संग्रह), शब्द संसार की यायावरी, यह हमारा समय, अतीत राग (गद्य), सुधीन्द्र (व्यक्ति और कविता), राजस्थान साहित्य अकादमी की पुरोधा शृंखला के अन्तर्गत प्रकाशित।

    सम्मान : मीराँ पुरस्कार—राजस्थान साहित्य अकादमी का सर्वोच्च पुरस्कार; बिहारी पुरस्कार—के.के. बिड़ला फाउंडेशन; लोकमंगल, मुम्बई पुरस्कार; अखिल भारतीय आकाशवाणी सम्मान (श्रेष्ठ वार्ताकार) आदि।

    यात्रा : छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन, लन्दन में राजस्थान राज्य द्वारा भेजे गए प्रतिनिधि मंडल के सदस्य।

    सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन।

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