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Gobar Ganesh

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  • Pages: 331
  • Year: 2016, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126729043
  •  
    ‘‘...‘गोबरगणेश’ को पढ़ते हुए मुझे अपनी सुध-बुध बिसर गई। यह अनुभव मुझे सबसे प्रिय और सुखद होता है। जिस रचना से वह धन्यता मिले, उसे धन्य ही कह सकता हूँ। नहीं तो क्या!’’ —जैनेन्द्र कुमार ‘‘...‘गोबरगणेश’ इस बार कुमाऊँ यात्रा में साथ ले गया और वहीं उसे पूरा पढ़ आया। उपन्यास मुझे अच्छा लगा और उस परिवेश में उसे पढऩा और भी अच्छा लगा। उससे कुछ ही पहले मनोहरश्याम जोशी का ‘कसप’ भी पढ़ा था। इसलिए कुमाऊँ का एक कंट्रास्टिंग चित्र भी सामने रहा। इससे पढऩे में एक विशेष प्रकार का आनन्द आया। सोचता हूँ कि ‘गोबरगणेश’ के बारे में कुछ लिखूँ...’’ —अज्ञेय ‘‘...विनायक के अनेक दोस्त उपन्यास में अपनी अलग पहचान तो बनाते ही हैं, साथ ही उनके माध्यम से एक उत्तर-भारतीय $कस्बे के सामाजिक जीवन की अनेक परतें अपने बुनियादी अन्तर्विरोधों के साथ उद्घाटित हुई हैं, जिनकी बहुआयामिता सचमुच प्रभावी है।...‘गोबरगणेश’ की भाषा और दृष्टि में, विशेषकर पहले खंड में, बहुत दूर तक एक कवि-उपन्यासकार की संवेदना की छाप मिलती है। यह बात उसे हिन्दी कथाकारों की एक खासी लम्बी और बड़ी परम्परा से जोड़ती है, जिसमें जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय, नरेश मेहता, धर्मवीर भारती, मुक्तिबोध आदि अनेक लोग हैं।...’’ —नेमिचन्द्र जैन [जनान्तिक, पृ. 106-07] ‘‘...विनायक की यह दुनिया चाल्र्स डिकेंस के पिप या ओलीवर या डेविड कॉपरफिल्ड के बचपन की दुनिया है—काल्पनिक, पर अनुभूत; आत्यन्तिक, पर विश्वसनीय—इन्द्रधनुषी मानवीय ऊष्मा लिये, वास्तविक यथार्थ से कहीं ज्यादा यथार्थ, कहीं ज्यादा संवेद्य। इस दुनिया के अन्न-जल से पला-पुसा विनायक वास्तविक जीवन-समर में प्रवेश करते ही जटिलता की चट्टान से टकराकर बिखरने लगता है...’’

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    Ramesh Chandra Shah

    जन्म : वैशाखी त्रयोदशी, 1937 अल्मोड़ा, उत्तरप्रदेश।

    शिक्षा : अल्मोड़ा  तथा  प्रयाग विश्वविद्यालय में।

    प्रकाशित कृतित्व—काव्य : कछुए की पीठ पर, हरिश्चन्द्र आओ, नदी भागती आई, प्यारे मुचकुन्द को, चाक पर समय तथा देखते हैं शब्द भी अपना समय के अतिरिक्त तीन बाल कविता-संग्रह। उपन्यास : गोबरगणेश, कि़स्सा ग़ुलाम, पूर्वापर, आखि़री दिन, पुनर्वास। छठा उपन्यास 'विभूतिबाबू की आत्मकथा’ शीघ्र प्रकाश्य। 'कि़स्सा ग़ुलाम’ आठ भारतीय भाषाओं में अनूदित। कहानी-संग्रह : जंगल में आग, मुहल्ले का रावण, मानपत्र, प्रतिनिधि कहानियाँ (राजकमल सीरीज़); थिएटर। निबन्ध-संग्रह : शैतान के बहाने, रचना के बदले, पढ़ते-पढ़ते, सबद निरन्तर, आड़ू का पेड़, स्वधर्म और कालगति तथा स्वाधीन इस देश में। यात्रा-वृत्तान्त : बहुवचन में दो यात्रा-वृत्तान्त संकलित तथा एक लम्बी छाँह। अंग्रेज़ी में : येट्स एंड एलियट : पर्सपैक्टिव्ज़ ऑन इंडिया, जयशंकर प्रसाद तथा टेमेनोए अकादमी लन्दन द्वारा चार व्याख्यानों की पुस्तिका प्रकाशित।

    सम्मान : सर्जनात्मक उपलब्धियों के लिए मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग का शिखर-सम्मान, कविता-संग्रह नदी भागती आई के लिए मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का भवानीप्रसाद मिश्र पुरस्कार, उपन्यास पूर्वापर के लिए भारतीय भाषा परिषद्, कलकत्ता तथा निबन्ध-संग्रह स्वधर्म और कालगति के लिए उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा सम्मानित।

    सम्प्रति : भोपाल के हमीदिया कॉलेज से अंग्रेज़ी विभाग के प्रोफ़ेसर-विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त होने के उपरान्त निराला सृजनपीठ, भोपाल के निदेशक पद पर कार्यरत।

    सम्पर्क : निराला  सृजनपीठ  सी-165/1, प्रोफ़ेसर्स कालोनी, भोपाल-462 002

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