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Gunjan

Gunjan

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  • Pages: 84p
  • Year: 1994
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180318122
  •  
    प्रस्तुत पुस्तक पाठकों के सामने है। इसमें सभी तरह की कविताओं का समावेश है; कुछ नवीन प्रयत्न भी। सुविधा के लिए प्रत्येक पद्य के नीचे रचना-काल दे दिया है। यदि 'गुंजन' मेरे पाठकों का मनोरंजन कर सका, तो मुझे प्रसन्नता होगी, न कर सका तो आश्चर्य न होगा, यह मेरे प्राणों की उन्मन गुंजन मात्र है। 'मेंहदी' में दूसरे वर्ण पर स्वरपात मधुर लगता है। तब यह शब्द चार ही मात्राओं का रह जाता है, जैसा कि साधारणत: उच्चरित भी होता है। प्रिय प्रियाऽह्लाद से 'प्रिय प्रि'-'आह्लाद' अच्छा लगता है। इस प्रकार की स्वतन्त्रता मैंने कहीं-कहीं ली है। 'अनिर्वचनीय' के स्थान पर 'अनिर्वच', 'हरसिंगार' के स्थान पर 'सिंगार' आदि। 'पल्लव' की कविताओं में मुझे 'सा' के बाहुल्य ने लुभाया था। 'गुंजन' में 'र' की पुनरुक्ति का मोह मैं नहीं छोड़ सका। 'सा' से, जो मेरी वाणी का संवादी स्वर एकदम 'रे' हो गया है, यह उन्नति का क्रम संगीत-प्रेमी पाठकों को खटकेगा नहीं, ऐसा मुझे विश्वास है। —सुमित्रानंदन पंत

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    Sumitranandan Pant

    सुमित्रानंदन पंत

    जन्म: 20 मई, 1900 कौसानी (उत्तरांचल में) ।

    शिक्षा: प्रारम्भिक शिक्षा कौसानी के वर्नाक्यूलर स्कूल में। 1918 में कौसानी से काशी चले गए, वहीं से प्रवेशिका परीक्षा पास की।

    प्रकाशित पुस्तके :

    कविताा-संग्रह: वीणा, ग्रन्थि, पल्लव, गुंजन, ज्योत्स्ना, युगपथ, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूली, मधुज्वाल, उत्तरा, रजत-शिखर, शिल्पी, सौवर्ण, युगपुरुष, छाया, अतिमा, किरण-वीणा, वाणी, कला और बूढ़ा चाँद, पौ फटने से पहले, चिदंबरा, पतझर (एक भाव क्रान्ति), गीतहंस, लोकायतन, शंखध्वनि,शशि की तरी, समाधिता, आस्था, सत्यकाम, गीत-अगीत,संक्रांति, स्वच्छंद !

    कथा-साहित्य : हार, पांच कहानियां !

    आलोचना एवं अन्य गद्य-साहित्य : छायावाद : पुनर्मूल्यांकन, शिल्प और दर्शन, कला और संस्कृति, साठ वर्ष : एक रेखांकन !

    पुरस्कार : 1960 में कला और बूढा चाँद पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार, 1961 में पद्मभूषण की उपाधि, 1965 में लोकायतन पर सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार, 1969 में चिदंबरा पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार !

    28 दिसम्बर 1977 को देहावसान !

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