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Hindi Ka Vishwa Sandarbha

Hindi Ka Vishwa Sandarbha

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  • Pages: 188p
  • Year: 2019, 3rd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183612562
  •  
    हिन्दी को वैश्विक सन्दर्भ प्रदान करने में विश्वभर में फैले हुए तीन करोड़ से ज्यादा प्रवासी भारतीयों का विशेष प्रदेय है। वे हिन्दी के द्वारा अन्य भाषा-भाषियों के साथ सांस्कृतिक संवाद कायम करते हैं। आज हिन्दी विश्व के सभी महाद्वीपों तथा राष्ट्रों—जिनकी संख्या एक सौ चालीस से भी अधिक है—में किसी-न-किसी रूप में प्रयुक्त हो रही है। इस समय वह विश्व की तीन सबसे बड़ी भाषाओं में से है। वह विश्व के विराट फलक पर नवलचित्र के समान प्रकट हो रही है। वह बोलने वालों की संख्या के आधार पर मन्दारिन (चीनी) के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा बन गई है जबकि वह जिन राष्ट्रों में प्रयुक्त हो रही है उनके संख्या-बल की दृष्टि से वह अंग्रेजी के बाद दूसरे क्रमांक पर है। हिन्दी को वैश्विक परिदृश्य प्रदान करने में फिल्मों, पत्र-पत्रिकाओं, प्रकाशन संस्थानों, भारत सरकार के उपायों, उपग्रह चैनलों, विज्ञापन-एजेंसियों, बहुराष्ट्रीय निगमों, यांत्रिक सुविधाओं तथा शिक्षण प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग से प्रशिक्षित पेशेवर मानव संसाधन का विशिष्ट अवदान रहा है। इसके अलावा उसमें विकसित विश्वस्तरीय साहित्य तथा साहित्यकारों का आधारभूत प्रदेय तो सर्वविदित है। ऐसी स्थिति में विश्व व्यवस्था को परिचालित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने तथा अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों में प्रयुक्त होने वाली विश्वभाषा के ठोस निकष एवं प्रतिमान पर हिन्दी का गहन परीक्षण सामयिक दौर की अपरिहार्य माँग है। इसी लक्ष्य को पाने तथा हिन्दी जगत को वैश्विक स्तर पर हिन्दी की शक्ति एवं सम्भावना से परिचित कराने के उद्देश्य को लेकर प्रस्तुत पुस्तक संकल्पित है। यह पुस्तक विदेश यात्राओं से प्राप्त सूचना एवं अनुभव, अनवरत अध्ययन, भाषिक चिन्तन तथा हिन्दी के विकसनशील व्यक्तित्व के तमाम आयामों की वैचारिक फलश्रुति है जो ग्यारह अध्यायों में हिन्दी के विश्व सन्दर्भ के वस्तुनिष्ठ एवं तथ्यगत विश्लेषण के प्रयास की अभिव्यक्ति है। हमें विश्वास है कि यह पुस्तक हिन्दी जगत में आत्मविश्वास भरेगी और वह खुले मन से इस पुस्तक का स्वागत करेगा।

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    Karunashankar Upadhyay

    करुणाशंकर उपाध्याय

    जन्म : 15 अप्रैल, 1968 को घोरका तालुकदारी, शिवगढ़, प्रतापगढ़ (उ.प्र.)।

    शिक्षा : एम.ए., पी-एच.डी., एस.ई.टी.।

    पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च : पाश्चात्य काव्य-चिंतन के विविध आंदोलन पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अध्येतावृत्ति पर शोधकार्य । हिंदी आचार्य कवियों का काव्यशास्त्रीय चिंतन विषय पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रदत्त बृहद शोध प्रकल्प  ।

    प्रकाशित कृतियाँ : सर्जना की परख, साहित्यकार बेकल : संवेदना और शिल्प, आधुनिक हिंदी कविता में काव्य-चिंतन, मध्यकालीन काव्य-चिंतन और संवेदना, पाश्चात्य काव्य-चिंतन, विविधा, आधुनिक कविता का पुनर्पाठ, हिंदी कथा-साहित्य का पुनर्पाठ, आवाँ: विमर्श, हिंदी साहित्य : मूल्य और मूल्यांकन, वक्रतुंड : मिथक की समकालीनता, ब्लैक होल विमर्श, माया गोविन्द : सृजन के अनछुए सन्दर्भ तथा साहित्य और संस्कृति के सरोकार ।

    सम्मान/पुरस्कार : महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी का बाबूराव विष्णु पराडकर पुरस्कार तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान, हिंदी सेवी सम्मान, पं. दीनदयाल उपाध्याय आदर्श शिक्षक सम्मान, आशीर्वाद राजभाषा सम्मान, विश्व हिंदी सेवा सम्मान, शिक्षक भारती गौरव सम्मान, मुंबई विश्वविद्यालय का सर्वोत्तम शिक्षक सम्मान, हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग का सम्मलेन सम्मान, जीवंती फाउंडेशन का साहित्य गौरव सम्मान तथा भारती गौरव सम्मान।

    संपादन : दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकों का संपादन ।

    सहलेखन : मानव मूल्यपरक शब्दावली का विश्वकोश तथा तुलनात्मक साहित्य का विश्वकोश ।

    संप्रति : प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबई-400098

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