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Itne Guman

Itne Guman

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  • Pages: 89p
  • Year: 1997
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171193102
  •  
    इतने गुमान सुदीप बॅनर्जी की कविता का असबाब और ज़बान का बरताव हमें उस विरासत की याद दिलाता है जिससे भारतीय उपमहाद्वीप का सांस्कृतिक जगत और जीवन बना है। यह किसी एक मुख्यधारा की कविता नहीं, ऐसे आदमी की अभिव्यक्ति है जो किसी चीज़ को भुलाना नहीं चाहता; जो बोलियों, शब्दों और मुहावरों को गहरी खदानों से निकालकर दिन के उजाले में रख देता है: उनके ऐसे रंग-रूप में, जिसके प्रायः हम आदी नहीं। सुदीप की कविता में काव्य भाषा के प्रचलित और व्यावहारिक रूपों को लेकर एक चुप्पी है। इस चुप्पी का सम्बन्ध उस रूहानियत से है जिसे कवि ने अपने इर्द-गिर्द रचा है। यह उसे समकालीनता की जकड़ से छुड़ाकर उसमें नए सिरे से दाख़िल होने की आज़ादी दिलाती है। इस आज़ादी में कवि बहुत दूर चहलक़दमी कर आता है - सदियों पार जाकर अपने अज़ीज़ों से संवाद करता है, उनकी दहलीज़ पर या उनकी जेब में कुछ रख आता है, बतौर निशानी कोई चीज़ उठा लाता है। वह उस ख़ामोशी को भी बार-बार छूता है जो विभिन्न युगों, सभ्यताओं और ज़बानों को एक-दूसरे से जोड़ती और हर तरह की दरारों को भरती है। सुदीप के यहाँ ग्रहों, नक्षत्रों, तारामंडलों की गतियों, चन्द्रमा की कलाओं, पृथ्वी की धड़कनों और करवटों से और सतह पर होती आहटों से एक अदृश्य आत्मिक संगीत निकलता सुनाई देता है। यह संगीत कवि के ‘रोज़मर्रा’ को एक सन्दर्भ, एक गहराई देता है और वर्तमान को नापने का एक पैमाना भी। सुदीप की कविता में प्रगतिकामी राजनीतिक चेतना और सामाजिक आलोचना के स्वर कहीं मुखर, कहीं दबी ज़बान में सुनाई पड़ते हैं लेकिन इनमें एक विशेष प्रकार की मार्मिकता है जो उनके नैतिक खुलूस और अन्तर्मन की सच्चाई को खोजते रहने के माद्दे से मिलकर एक अटूट और शान्त लौ का रूप ले लेती है। समकालीन हिन्दी कविता में सुदीप की कविता अध्यात्म और प्रगतिकामी मानववाद के मेल का सुखद उदाहरण है। यह तीसरा कविता संग्रह इतने गुमान इस सिलसिले में उनके कवि के अनूठे दर्जे को रेखांकित करता है। मानक संकल्पनाओं के सही बोध हेतु जरूरी कोश। किसी भी विषय की महत्त्वपूर्ण संकल्पनाओं के सही बोध और अधिगम के लिए मानक तकनीकी शब्दावली की नितांत आवश्यकता होती है। यह सर्वविदित है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिंदीभाषी राज्यों में लाखों विद्यार्थियों की शिक्षा और परीक्षा का माध्यम हिंदी रहा है, परंतु अनेक दशक बीत जाने के बाद भी विभिन्न विषयों पर हिंदी में ऐसी मानक व स्तरीय पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं जिनमें हिंदी की मानक तकनीकी शब्दावली का प्रयोग किया गया हो। परिभाषा कोश की शृंखला में इसी कमी को पूरा करने का एक प्रयास किया गया है। प्रस्तुत पुस्तक ‘प्रबंध परिभाषा कोश’ में अर्थशास्त्र की विभिन्न शाखाओं, जैसे प्रबंध के सिद्धांत, संगठनात्मक व्यवहार, विपणन प्रबंध, वित्तीय प्रबंध तथा कार्मिक प्रबंध आदि से संबंधित 1000 से भी अधिक संकल्पनाओं की व्याख्या की गई है और वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा निर्मित मानक शब्दावली का प्रयोग किया गया है।

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    Sandeep Banerji

    Sandeep

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