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Janvasa

Janvasa

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  • Pages: 99p
  • Year: 2005
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171199836
  •  
    जनवासा की प्रस्तुति देखकर भूदान के भ्रष्टाचार, स्वयंसेवियों की स्वयं की सेवा और क्रांतिकारी धारा की पतनशीलता की समकालीनता का दर्शन हुआ। समय के सच पर भारती की अद्भुत पकड़ है। - अरुण कुमार, टाइम्स ऑफ इंडिया, पटना सच कहा जाए तो जनवासा मानवीय संवेदनाओं का एक ऐसा कोलॉज है जिसका हर रंग सामाजिक सरोकार के ताने-बाने में समाया है। नाटक नक्सलवादी विचार- धाराओं के टकराव, भूदान आंदोलन, वर्णव्यवस्था की बढ़ती खाई, अंधविश्वास से मुक्ति के द्वार की खोज और अशिक्षा के बीच संभ्रांत वर्गों की स्वार्थलोलुपता के छद्म रूपों को नग्न करता है। बल्कि समाज की अंधी सुरंग में रोशनी भी दिखाता है, जैसे अब भी बहुत कुछ समाप्त नहीं हुआ है। - दैनिक जागरण, पटना मेहनतकश भारतीय जनमानस में उपजे अनेक प्रश्नों की पृष्ठभूमि में आज की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति का आइना है ‘जनवासा’। इस नाटक में सुधारवादी एवं तथाकथित क्रांतिकारी, दोनों ही अपनी सूरत पहचान सकते हैं। - कामरेड डी. प्रकाश ‘जनवासा’ में क्रांति और कल्याण की दूकानदारी करनेवालों के असली स्वरूप को उजागर किया गया है। सत्य के पक्ष में खड़ा होने पर कौन मित्र बनेंगे, कौन दुश्मन - इसकी परवाह किए बगैर रवीन्द्र भारती ने साहित्यिक ईमानदारी का परिचय दिया है। - सुरेश भट्ट, एक्टिविस्ट एक तीखा एवं विचारोत्तेजक नाटक है ‘जनवासा’। भाषा, शिल्प, संगीत एवं कथन, उपकथन हृदयग्राही है। बेहद रोचक यह नाटक सिर्फ राजनीतिक-सामाजिक स्थितियों की सच्चाई का न सिर्फ दर्शन कराता है बल्कि भारतीय लोक परम्परा के बहुरंग को भी उजागर करता है। बहुत दिनों के बाद एक बढ़िया प्ले देखने को मिला। - डॉ. खालिक चौधरी (समाजशास्त्री)

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    Ravindra Bharti

    जन्म: 1951

    कविता-संग्रह : जड़ों की आखिरी पकड़ तक, धूप के और करीब, यह मेरा ही अंश है, नचनिया !

    कविताएँ कई भाषाओँ में अनूदित !

    नाटक : कंपनी उस्ताद, फूकन का सुथन्ना, जनवासा, अगिन तिरिया अरु कौआहंकनी (फिल्म निर्माण) !सम्मान और पुरस्कार : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् से विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान, मानव संसाधन मत्रालय, भारत सरकार से सीनियर फेलोशिप !

    1975 में आपातकाल के दौरान कविता पर कारावास !

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