• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

You're currently on:

Jo Kuchh Rah Gaya Ankaha

Jo Kuchh Rah Gaya Ankaha

Availability: In stock

-
+

Regular Price: Rs. 695

Special Price Rs. 626

10%

  • Pages: 224p
  • Year: 2019, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789388933292
  •  
    ‘जो कुछ रह गया अनकहा’ लेखक के जीवनदृसंघर्षों की औपन्यासिक गाथा है। इसे पढ़ते हुए लेखक के जीवन से ही नहीं, युग-युग के उस सच से भी अवगत हो सकते हैं जो अपनी प्रक्रिया में एक दिन एक मिसाल बनता है। उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर का गाँव वीरपुर, जहाँ लेखक का जन्म हुआ, यह खाँटी बाँगर मिट्टी का क्षेत्र है। यहाँ सिंचाई के अभाव में तब मुश्किल से ज्वार, बाजरा की फसल उपजती। लेखक ने खेती करते हुए पढ़ाई की तो आजीविका के लिए भटकाव की स्थिति से गुजरना पड़ा। सबसे पहले कानपुर में 60 रुपये मासिक वेतन की नौकरी की, यह नौकरी रास नहीं आई तो नौ माह पश्चात् ही घर आ गए और गाँव के निजी संस्कृत विद्यालय में अध्यापन का कार्य सँभाला। पढ़ने की ललक निरन्तर बनी रही तो धीरे-धीरे एम-ए-, एम-एड- तक की शिक्षा प्राप्त कर ली। फिर बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के जिला सचिव का पद मिला। 1977 में सीवान में अखिल भारतीय भोजपुरी सम्मेलन हुआ तो सीवान जिला इकाई का सचिव-पद मिला। फिर 1992 में मुजफ्रफरपुर राज्य संघ में महासचिव हुए। 2008 में अखिल भारतीय शान्ति एकजुटता संगठन के सौजन्य से वियतनाम में आयोजित द्वितीय भारत वियतनाम मैत्री महोत्सव में शिष्टमंडल के सदस्य रहे। समय तेजी से परिवर्तित होता गया, लेखक को वह दौर भी देखने को मिला जब दुनिया-भर में शिक्षा और शिक्षकों के समक्ष एक ही प्रकार की चुनौतियाँ आईं। शिक्षा पर निजीकरण और व्यावसायीकरण का खतरा मँडराया, जब शिक्षकों के संवर्ग को समाप्त कर अल्पवेतन, अल्प योग्यताधारी शिक्षकों की नियुक्ति कर शिक्षा को पूर्णतः बाजार के हवाले कर देने की योजना को बढ़ावा मिला। लेखक इससे विचलित तो नहीं हुआ परन्तु शारीरिक तौर पर अस्वस्थता ने जीवन-नौका को डुबाने की कगार पर ला दिया। अन्ततः एन्जियोप्लास्टी के कष्ट को भी झेलना पड़ा। एक बार फिर जीवन संघर्षों से जूझने को बाध्य हो गया। तब लगा जीवन-संघर्षों से ही निखरता है जैसे सोना अग्नि में तपकर चमकता है। हम कह सकते हैं कि यह पुस्तक अपने आख्यान में जीवन्त तो है ही, अपने पाठ में जीने और जीतने की कला भी सिखाती है।

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    Kedarnath Pandey

    केदारनाथ पाण्डेय

    जन्म: 1 जनवरी, 1943_ कोटवा नारायणपुर, बलिया, उत्तर प्रदेश।      

    शिक्षा: एम-ए- (हिन्दी एवं संस्कृत), बी-एड‑, साहित्य रत्न। तैंतीस वर्षों तक सीवान के विभिन्न विद्यालयों तथा विद्याभवन शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, सीवान में अध्यापन। गया दास कबीर उच्च विद्यालय, रसीदचक, मठिया, सीवान एवं मॉडर्न उच्च विद्यालय, पटना में प्रधानाध्यापक पद से 1996 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति। शिक्षक  संगठन तथा टेªड यूनियन आन्दोलन से जुड़ाव। अध्यापन काल से ही  नाट्य-लेखन और अभिनय में गहरी रुचि तथा साहित्य, शिक्षा के सामाजिक सरोकारों से गहरा लगाव एवं सामयिक    विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर लेखन।

    प्रकाशित कृतियाँ: ‘पृथ्वीराज चौहान’, ‘कैकेयी’, ‘गुरुदक्षिणा’, ‘वीर शिवाजी’ (हिन्दी) और ‘शुरुआत’ (भोजपुरी) नाट्य-पुस्तकें हैं। वहीं अन्य पुस्तकों में ‘शिक्षा के सामाजिक सरोकार’, ‘मैल धुल जाने के गीत’, ‘यादों के पन्ने’, ‘शिक्षा को आन्दोलन बनाना होगा’, ‘बीते दौर के भी गीत गाए जाएँगे’, ‘महाकाल की भस्म आरती’, ‘गाँव से शहर का रास्ता’, ‘आज का संकट’, ‘शिक्षा के सवाल’ आदि शामिल हैं।

    सम्प्रति: बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के अध्यक्ष एवं बिहार विधान परिषद् के सदस्य।

    loading...
      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
      • Funda An Imprint of Radhakrishna
      • Korak An Imprint of Radhakrishna

    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144