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Kavita Ka Janpad

Kavita Ka Janpad

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  • Pages: 300p
  • Year: 2016, 2nd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171191169
  • ISBN 13: 9788171191161
  •  
    इस संचयन में कविता के समाज के साथ अन्तर- संबंध, उसका आत्म संघर्ष, अमानवीयीकरण, मध्य- वर्गीय चेतना, एशियाई अस्मिता, शब्दप्रयोग, बिम्ब आदि पर विचार है । इसके अतिरिक्त अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, गजानन माधव मुक्तिबोध, त्रिलोचन, कुंवर नारायण, विजय देव नारायण साही, रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, धूमिल, कमलेश और विनोद कुमार शुक्ल की कविता का विश्लेषण है । हमारा विश्वास है कि यह सामग्री और इसके लेखक पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में जो गम्भीर और विचारोत्तेजक हुआ है, उसमें शामिल हैं । उनके माध्यम से हमारी कविता की समझ और कवियों के संघर्ष की हमारी पहचान और परख गहरी होती है । हम उन अकारथ हो रहे पदों और अवधारणाओं से मुक्त होकर, जिनसे आज की ज्यादातर आलोचना ग्रस्त है, नयी ताजगी और विचारोत्तेजना से अपने समय की मूल्यवान कविता, उसकी अपने समाज में जगह और शब्द के विराट् अवमूल्यन के इस क्रूर समय में कविता की भाषा के अनेकार्थी और बहु- स्तरीय जीवट और संघर्ष को समझ सकते हैं । यह आलोचना कविता के साथ है.. .उससे युगपत है । जैसे हमारी कविता में जीवन, अनुभव और भाषा को समझने और विन्यस्त करने के अनेक स्तर और प्रक्रियाएँ हैं, हमारी आलोचना में र्भा कविता और उसके माध्यम से अपने समय और उसकी उलझनों तक पहुँचने और उन्हें परिप्रेक्ष्य देने के अनेक स्तर और दृष्टियाँ सक्रिय हैं । जैसे कि कविता में वैसे ही, सौभाग्य से, आलोचना में रुचि और दृष्टि का प्रजा- तन्त्र है । हम इस प्रसन्न विश्वास के साथ यह संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं कि यहाँ एकत्र आलोचना कवितादर्शी और जीवनदर्शी है : अखबारी सतहीपन और सनसनीखेजी, वैचारिक एकरसता के आत्मतुष्ट समय में वह हमें अपनी सूक्ष्मता और जटिलता से विचलित कर कविता की अर्थसमृद्ध और गहरी समझ की ओर ले जाने में समर्थ आलोचना है । -भमिका से अपने को 'कविता का निर्लज्ज पक्षधर' कहनेवाले अशोक वाजपेयी उन थोड़े-से व्यक्तियों में से हैं जिन्होंने पिछले तीस वर्षों में हमारे समाज में कविता की समझ बढ़ाने और जगह बनाने के लिए आलोचना, सम्पादन और आयोजन आदि के अनेक स्तरों पर विलक्षण कल्पनाशीलता और लगातार हिम्मत से काम किया है । उनकी गणना हिन्दी ही नहीं, भारतीय भाषाओं के मूर्धन्य आलोचकों और संस्कृति- ' कर्मियों में होती एं । स्थापना से लगातार 9 वर्षों तक वे भारत भवन, भोपाल के न्यासी सचिव रहे । विश्व कविता समारोह, एशियाई कविता समारोह, कवि भारती, अमरीका में भारतीय कविता उत्सव आदि का उन्होंने संयोजन किया है और वे एक भारतीय कवि-बुद्धिजीवी के रूप में वाशिंगटन, शिकागो, हार्वर्ड, प्राहा, बुडापेस्ट, न्यूयार्क, मास्को, तोक्यो, जैराश, कैम्ब्रिज, ढाका, आविन्यो आदि के अन्तर्राष्ट्रीय समारोहों और सम्वादों में शामिल हुए हैं । इक्यावनवर्षीय अशोक वाजपेयी के छ: कवितासग्रह प्रकाशित हैं, जिनमें सबसे ताजा कुमार गन्धर्व के लिए विदागीत 'बहुरि अकेला' है । उनकी दो आलोचना पुस्तकें हैं । उन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी में कई पत्रिकाओं जैसे समवेत, पहचान, पूर्वग्रह, बहुवचन और कविता एशिया की स्थापना और सम्पादन किया है । 1974 में स्थापित आलोचना- द्वैमासिक 'पूर्वग्रह' के वे आरंभ से उसके शतांक तक, जो उसका अन्तिम अंक भी हुआ, सम्पादक रहे हैं । अब नये हिन्दी अनियतकालीन .समास' की शुरूआत कर रहे हैं । उन्होंने शमशेर बहादुर सिंह, गजानन माधव मुक्तिबोध की प्रतिनिधि कविताओं, कुमार गन्धर्व और निर्मल वर्मा पर और सृजनात्मक आलोचना के निबन्धों के संग्रहों का सम्पादन भी किया है । 1965 से, भारतीय प्रशासन सेवा के अन्तर्गत, मध्य प्रदेश में 27 वर्ष सक्रिय रहने के बाद अब भारत सरकार के संस्कृति विभाग में संयुक्त सचिव हैं । वे पहले अनेक वर्षो तक मध्य प्रदेश में शिक्षा, संस्कृति, जनसम्पर्क, पर्यटन, विज्ञान और तकनलाजी विभागों के सचिव रह चुके हैं ।

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    Ashok Vajpeyi

    अशोक वाजपेयी

    जन्म : 16 जनवरी, 1941, दुर्ग (मध्य प्रदेश)।

    शिक्षा : सागर विश्वविद्यालय से बी.ए. और सेंट स्टीवेंस कॉलेज, दिल्ली से अंग्रेजी में एम.ए.।

    कृतियाँ : ‘शहर अब भी संभावना है’, ‘एक पतंग अनंत में’, ‘अगर इतने से’, ‘कहीं नहीं वहीं’, ‘समय के पास समय’, ‘इबारत से गिरी मात्राएँ’, ‘दुख चिट्ठीरसा है’, ‘कहीं कोई दरवाज़ा’, ‘तत्पुरुष’, ‘बहुरि अकेला’, ‘थोड़ी-सी जगह’, ‘घास में दुबका आकाश’, ‘आविन्यों’, ‘जो नहीं है’, ‘अभी कुछ और’, ‘नक्षत्रहीन समय में’, ‘कम से कम’ प्रमुख संग्रहों में हैं। कविता के अलावा आलोचना की ‘फिलहाल’, ‘कुछ पूर्वग्रह’, ‘समय से बाहर’, ‘सीढिय़ाँ शुरू हो गई हैं’, ‘कविता का गल्प’, ‘कवि कह गया है’, ‘कविता के तीन दरवाज़े’आदि कृतियाँ प्रकाशित।

    सम्मान : ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’, ‘दयावती मोदी कविशेखर सम्मान’ और ‘कबीर सम्मान’ के अलावा फ्रेंच सरकार का ‘आफिसर आव् द आर्डर आव् आट्र्स एंड लैटर्स, 2005’ और पोलिश सरकार का ‘आफिसर आव् द आर्डर आव् क्रास, 2004’ सम्मान।

    वे भारतीय प्रशासनिक सेवा में साढ़े तीन दशक, भारत भवन न्यास के सचिव और अध्यक्ष, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के संस्थापक-कुलपति, केन्द्रीय ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष रह चुके हैं। इन दिनों दिल्ली में रज़ा फाउंडेशन के प्रबन्ध-न्यासी हैं।

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