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Kis Prakar Ki Ha Yah Bhartiyata ?

Kis Prakar Ki Ha Yah Bhartiyata ?

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  • Pages: 139p
  • Year: 2004
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171196306
  •  
    पंडित जवाहरलाल नेहरू समेत उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों के सभी विचारक, अलावा गाँधी के, ‘प्रगति’ की अवधारणा के सम्मोह में थे जो उनके अनुसार मनुष्यता को शोषण आदि से मुक्त कर देगी । लेकिन अब हम जानते हैं कि इससे एक दूसरे तरह की प्रभुता कायम हो जाती है जिससे पृथ्वी विनाश की ओर जा सकती है । इसलिए मैं सोचता हूँ कि इक्कीसवीं शती विकास की अवधारणा पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाएगी । उन्नीसवीं शती में एक समय था जब कार्ल मार्क्स ने कहा था कि सारी आलोचना धर्म की आलोचना से शुरू होती है । उनका आशय यह था कि धर्म सर्वज्ञ होने का दावा करता है, इस बात का दावा कि उसके पास सभी प्रश्नों का हल है । नए विचार–विमर्श की कोई गुंजाइश ही नहीं थी क्योंकि एक ऐसा दावेदार पहले से ही मौजूद था जो सोचता था कि उसके पास सारे जवाब सहज उपलब्ध हैं । इसलिए चिंतन तभी संभव था जब आप धर्म की आलोचना करें । आज जब हम बीसवीं शताब्दी के अंत की ओर जा रहे हैं, कोई भी नया सृजनात्मक चिंतन तभी संभव है जब आप विकास के विचार को प्रश्नांकित करने का जोखिम उठाएँ । जो विकास के प्रश्न को प्रश्नांकित नहीं कर सकते, वे कुछ भी नया नहीं सोच सकते । इस तरह यहाँ भी शताब्दी का अंत एक नए चिंतन की शुरुआत होगा जहाँ विकास को सुख और मुक्ति के एकमात्र स्रोत की तरह देखे जाने को प्रश्नांकित किया जाएगा ।

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    U. R. Ananthamurthy

    यू–आर– अनन्तमूर्ति
    जन्म : 21 दिसम्बर, 1932 ई– में मिलिगे नामक गाँव, जिला शिमोगा (कर्नाटक) ।
    शिक्षा : मैसूर विश्वविद्यालय से अंगे्रजी साहित्य में एम–ए– और बर्मिंघम विश्वविद्यालय (इंग्लैंड) से पी–एच–डी– ।
    कन्नड़ के प्रख्यात उपन्यासकार और कथा–लेखक । यदा–कदा कविताओं की भी रचना ।
    सन् 1975 में आयोवा विश्वविद्यालय, 1978 में तुफ्त्स विश्वविद्यालय (अमेरिका) में विज़िटिंग प्रोफेसर और 1985 में आयोवा विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय लेखक सम्मेलन में हिस्सेदारी । सन् 1987 से 1991 तक महात्मा गां/ाी विश्वविद्यालय, कोट्टायम के उप–कुलपति और सन् 1980–1992 के बीच मैसूर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर–पद पर कार्य । नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली के चेयरमैन और साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष–पद पर भी कार्यरत रहे ।
    भारतीय ज्ञानपीठ सहित साहित्य, संस्कृति और फिल्म क्षेत्र के अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित । देश–विदेश में आयोजित अनेक साहित्य–सम्मेलनों में व्याख्यान और अनेक संस्थाओं की मानद सदस्यता । अवस्था, संस्कार आदि उपन्यासों पर फिल्मों का निर्माण । अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच, हंगेरियन, हिन्दी, बांग्ला, मलयालम, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं में रचनाओं का अनुवाद ।
    हिन्दी में अनूदित कृतियाँ : संस्कार, अवस्था, भारतीपुर (उपन्यास)य घटश्राद्ध, आकाश और बिल्ली (कहानी संग्रह) ।
    सम्प्रति : चेयरमैन, फिल्म एंड टेलिविज़न इंस्टीट्यूट ।

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