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Krishnaveni Mein Sandhya

Krishnaveni Mein Sandhya

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  • Pages: 154p
  • Year: 2002
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171197795
  •  
    जैसे सूर्य का उगना शाश्वत है, वैसे ही भूख भी शाश्वत है । चाहे वह भूख सत्ता की हो या किसी और चीज की । भूख तो भूख ही है । और जब दो भोजन के भूखे आपस में टकराते हैं-खाद्य-पदार्थों को झपटने के लिए, तो फिर उनमें गुत्थम-गुत्था शुरू हो जाती है; लेकिन जब राज-पाट के लिए लड़ाई हो, सत्ता-प्राप्ति की लड़ाई हो तो फिर दोनों पक्ष इस कदर कूरता का नंगा नाच करते हैं कि गर्दनें गाजर-मूली की तरह कटने लगती हैं । दोनों पक्षों में समझौता होने तक लाशों का ढेर लग जाता है । और फिर आते हैं-अवसाद के क्षण, मातम के क्षण! सगे-सम्बन्धियों की मृत्यु से उपजी कचोट के क्षण! आँसुओं से भीगी आँखों में होते हैं फिर पश्चात्ताप के क्षण । विशाल उत्कल महाराज्य के महानायक गजपति प्रतापरुद्र की ऐसी ही करुण-गाथा है- कृष्‍णावेणी में संध्या गंगा से कावेरी तक फैले विशाल उत्कल महाराज्य की पतनोम्मुखता की त्रासदी है- कृष्णावेणी में संध्‍या घर के भेदी गोविन्द विद्याधर की कुटिल चाल से बंगाल-नवाब हुसैन शाह उत्कल के राजाओं पर आक्रमण कर देता है; किन्तु इस दोरान उसका ऐसे वीरों से सामना होता है कि कुछ शर्तो के साथ वह समर-क्षेत्र से पलायन कर जाता है । कर्णाट राजा कृष्णदेव राय का समर-कौशल, उसके मन्त्री तिमरसु की कूटनीति, गजपति महाराजाओं के द्वारा स्थापित दक्षिण के दर्जनों दुर्गो का पतन, रामानन्द राय का वैराग्य, तिरूमल्ल राय की वीरगति, राजकुमार वीरभद्र की भरी सभा में आत्महत्या, राजकुमारी जगन्मोहिनी का सन्धि की शर्त बनकर जाना, उसके प्रणय- की विडम्बना इत्यादि ऐतिहासिक घटनाएँ अपने कलेवर में छिपाए हुए है यह पुस्तक! पूर्व खंड की तत्कालीन जीवन्त तथा सरस घटनाओं से साक्षात्कार करानेवाली पठनीय पुस्तक है- कृष्णावेणी में सधा .'

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    Surender Mahanti

    जन्म: 21.6.1922।

    प्रवीण राजनेता, पत्रकार और साहित्यकार।

    1942 में स्वतंत्रता-संग्राम में योगदान। दो दशक तक लोकसभा तथा राज्यसभा के सदस्य। भारतीय प्रतिनिधि के रूप में चीन, रूस, उत्तर कोरिया तथा मंगोलिया आदि देशों का भ्रमण। ‘पद्मश्री’ से सम्मानित।

    1945 से ही ‘जनसत्ता’ साप्ताहिकी का सम्पादन। आगे चलकर ‘गणतन्त्र’, ‘कलिंग’ तथा ‘सम्वाद’ जैसे लोकप्रिय दैनिकों का सम्पादन और जनमत-निर्माण मं संलग्न। लगभग पन्द्रह सामाािजक, ऐतिहासिक, जीवनीपरक, राजनीतिक उपन्यासों की रचना जिनमें नील शैल, नीलाद्रि विजय, अन्धदिगन्त, शताब्दी के सूर्य इत्यादि काफी लोकप्रिय। चौदह कहानी-संकलन में जिनमें सबुज पत्र और धूसर गोलाप, मरालर मृत्यु, महानिर्वाण काफी चर्चित हुए। ओड़िया साहित्य के इतिहासकार तथा समालोचक के रूप में प्रतिष्ठित। अंग्रेजी में भी कई ग्रंथ प्रकाशित।

    साहित्य अकादमी के पुरस्कार, सारला सम्मान इत्यादि अनेक सम्मानों से सम्मानित व ओडिशा साहित्य अकादमी के सभापति रहे।

    निधन: 21.11.1990

    राधाकान्त मिश्र हिन्दी तथा ओड़िआ दोनों भाषाओं में प्रवीण। ओडिशा सरकार के विभिन्न कॉलेजों में तथा विश्वभारती, शान्तिनिकेतन में अध्यापन, हिन्दी के प्रोफेसर, गंगाधर महाविद्यालय (स्वायत्त) के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त।

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