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Kuchh Rafoo Kuchh Thigare

Kuchh Rafoo Kuchh Thigare

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  • Pages: 79p
  • Year: 2004
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 8126708468
  •  
    यह तो अच्छा हुआ कि कविता मेरे साथ है जो यह भरोसा दिलाती है कि कोई भी पथ कभी समाप्त नहीं होता और सब कुछ गँवा देने के बाद भी कुछ बचा रहता है। अपने ग्यारहवें कविता-संग्रह के साथ उपस्थित अशोक वाजपेयी की अथक और अदम्य जिजीविषा इन ताज़ा कविताओं में उदास विवेक और आत्मस्वीकार के बीच गहरे संयम के साथ नाजुक ढंग से सन्तुलित हैं। कुल एक वर्ष की अवधि में लिखी गयी ये कविताएँ, कई बार उदासी से घिरी होने के बावजूद, अपनी पारदर्शिता में उजली और निर्मल हैं। सारे ध्वंस और नाश के विरुद्ध कविता को अपने लिए एकमात्र बचाव माननेवाले इस कवि की भाषा, सयानापन और शिल्प पर सहज अधिकार एक बार फिर सत्यापित करते हैं कि हमारे समय में कविता मनुष्य की हालत, उसकी उलझनों और जीवट का सूक्ष्म बखान करती है और ऐसा करते हुए हमें सचाई में ऐन्द्रिय शिरकत का अवसर देती है। अशोक वाजपेयी की आवाज़, हमेशा की तरह, निजी और समाजधर्मी एक साथ है और वे लगातार अपने को वेध्य और बेबाक बनाये हुए हैं। उनकी कविता के केन्द्र में साधारण जीवन की आभा और छवियाँ हैं जिन्हें उनकी भाषा अनूठे शब्दालोक और समयातीत आशयों से उद्दीप्त करती है।

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    Ashok Vajpeyi

    1970 में अपने निबंध-संग्रह 'फ़िलहाल' से हिंदी में आलोचना-प्रवेश करनेवाले कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी लगभग एक अधसदी से कविता, साहित्य, संस्कृति, संगीत, रूपंकर कलाओं आदि पर हिंदी और अंग्रेजी में आलोचना लिखते रहे हैं ! उन्होंने आलोचना की भाषा को नई ताजगी और सूक्ष्मता देने के साथ-साथ उसे सामाजिक संवाद का हिस्सा बनाने में सार्थक भूमिका निभाई है !

    उनकी प्रकाशित आलोचना पुस्तकों में 'फ़िलहाल', 'कुछ पूर्वग्रह', 'कविता का गल्प', 'सीढियां शुरू हो गई हैं', 'कभी-कभार', 'यहाँ से वहां' , 'कुछ खोजते हुए', 'पुनर्भव', 'समय से बाहर' आदि शामिल हैं !

    अशोक वाजपेयी को साहित्य अकादेमी पुरस्कार (जो उन्हें 1994 में मिला उसे बढती असहिष्णुता के विरोध में 2015 में लौटा दिया), दयावती मोदी कविशेखर सम्मान, कबीर सम्मान, समन्वय भाषा सम्मान आदि से अलंकृत किया गया है ! फ्रेंच और पोलिश सरकारों ने उन्हें उच्च नागरिक सम्मान दिए हैं ! 2011 में उन्होंने उत्तर प्रदेश सर्कार का भारत भारती पुरस्कार विरोधस्वरुप स्वीकार नहीं किया था !

    वे 35 वर्ष भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे ! महात्मा गाँधी अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के सस्थापक-कुलपति, केन्द्रीय ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष रहे हैं और इन दिनों रजा फाउंडेशन के प्रबंध-न्यासी हैं ! वे भारत भवन न्यास के संस्थापक न्यासी सचिव और अध्यक्ष भी रहे हैं ! हिंदी आलोचना की पत्रिका 'पूर्वग्रह' का उन्होंने लगभग 16 वर्षों तक संपादन किया !

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