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Laalbatti Ki Amritkanyaanyen

Laalbatti Ki Amritkanyaanyen

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  • Pages: 151p
  • Year: 2019, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789388933216
  •  
    कुसुम खेमानी का यह उपन्यास ‘लालबत्ती की अमृतकन्याएँ’ कथावस्तु की दृष्टि से एक साहसिक कदम माना जा सकता है क्योंकि यह वह इलाका है जिस पर लिखने से हिन्दी लेखकों की कलम प्राय: गुरेज करती है। फिर भी इस दिशा में कुछ उल्लेखनीय कृतियाँ तो देखने को मिलती ही हैं, यह उपन्यास उसी शृंखला की नवीनतम कड़ी है। यों उपन्यास कोलकाता के ‘सोनागाछी’ पर केन्द्रित है लेकिन यह लालबत्ती गली हर शहर और हर कस्बे में होती है और अन्त:सलिला की तरह समाज के अन्तर में बहती रहती है। समाज इन स्त्रियों को विषकन्याएँ मानता है पर दरअसल ये समाज के भीतर छिपी गन्दगी को फैलने से रोकने के साथ ही उसका परिष्करण भी करती हैं और इस बिन्दु पर आकर ये ‘विषकन्याएँ’ अमृतकन्याओं में बदल जाती हैं। उपन्यास की कथा विष से अमृत की ओर बढऩे की संघर्ष-गाथा है क्योंकि उपन्यास की पात्र वे स्त्रियाँ हैं, जिन्हें अमृत से वंचित कर ‘विष’ की ओर ढकेल दिया गया है। उपन्यास में इन स्त्रियों की रोज़-रोज़ की प्रताडऩा, अपमान और हत्या जैसे रोंगटे खड़े कर देनेवाले प्रसंगों का चित्रण कुसुम खेमानी ने जिस भाषाई कौशल और शिल्पगत दक्षता के साथ किया है, वह देखते ही बनता है। पहला पन्ना खोलते ही उपन्यास किसी रोचक फिल्म की तरह हमारे सामने खुलता चला जाता है। यह बतरस शैली डॉ. कुसुम खेमानी का अपना निजी और विशिष्ट कौशल है जो पाठकों को अन्त तक बाँधे रखता है। उपन्यास की कथा में सहारा देनेवाले हाथों का सन्दर्भ ही नहीं है बल्कि इन पतिता स्त्रियों द्वारा गिरकर खुद उठने और सँभलने की कोशिशों का कलात्मक मंथन भी है। ‘लावण्यदेवी’, ‘जडिय़ाबाई’ और ‘गाथा रामभतेरी’ जैसे उपन्यासों से गुज़रने के बाद, निस्सन्देह; यहाँ यह कहा जा सकता है कि इतनी खूबियों से भरा-पूरा यह उपन्यास अगर किसी का हो सकता है, तो वह सिर्फ कुसुम खेमानी का हो सकता है। —एकान्त श्रीवास्तव

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    Kusum Khemani

    डॉ. कुसुम खेमानी

    जन्म : 19 सितम्बर, 1944

    शिक्षा : एम.ए. (प्रथम श्रेणी),

    पी-एच.डी. कलकत्ता

    विश्वविद्यालय।

    सृजन : सचित्र हिन्दी बालकोश, हिन्दी-अंग्रेजी बालकोश (कोश); हिन्दी नाटक के पाँच दशक (आलोचना); सच कहती कहानियाँ, एक अचम्भा प्रेम, अनुगूँज जि़न्दगी की (कहानी-संग्रह); एक शख्स कहानी-सा (जीवनी); कहानियाँ सुनाती यात्राएँ (यात्रा-वृत्तान्त); कुछ रेत... कुछ सीपियाँ... विचारों की (ललित निबन्ध); लावण्यदेवी, जडिय़ा बाई (उपन्यास)।

    अनुवाद एवं सम्पादन : जन-अरण्य (उपन्यास, शंकर), चश्मा बदल जाता है (उपन्यास, आशापूर्णा देवी), ज्योतिर्मयी देवी के कहानी-संग्रह का अनुवाद एवं सम्पादन, ‘वागर्थ’ का सम्पादन।

    विशेष : ‘लावण्यदेवी’ उपन्यास का अंग्रेजी, बांग्ला, नेपाली एवं मलयालम में अनुवाद। ‘कहानियाँ सुनाती यात्राएँ’ बांग्ला, राजस्थानी एवं मलयालम में प्रकाशित। ‘लावण्यदेवी’ उपन्यास का तमिल में डॉ. एन. जयश्री द्वारा एवं तेलुगू में लावण्य नारला द्वारा शोध एवं अनुवाद। ‘सच कहती कहानियाँ’ की कथाभाषा पर डॉ. सुहासिनी (तमिल), करमजीत कौर (पंजाबी), विनीता सिंह (हिन्दी) एवं अंजना कुकरैती (कन्नड़) द्वारा शोध। ‘रश्मिरथी माँ’ कहानी पर बांग्ला में टेलीफिल्म का निर्माण। ‘साहित्य में उच्च मूल्यों की स्थापना’ (सन्दर्भ : ‘लावण्यदेवी’ उपन्यास) विषय पर औरंगाबाद यूनिवर्सिटी द्वारा सेमिनार आयोजित।

    सम्मान : कुसुमांजलि साहित्य सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, हरियाणा गौरव सम्मान, भारत निर्माण सम्मान, रत्नादेवी गोयनका वाग्देवी पुरस्कार, पश्चिम बंग प्रान्तीय मारवाड़ी सम्मेलन पुरस्कार, $कौमी एकता पुरस्कार, भारत गौरव सम्मान, समाज बन्धु पुरस्कार।

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