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Lok-Sahitya Ki Bhoomika

Lok-Sahitya Ki Bhoomika

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  • Pages: 304p
  • Year: 2019, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789389243970
  •  
    इस पुस्तक की रचना लोक-साहित्य के सिद्धान्त ग्रन्थ के रूप में की गयी है। अतएव इसमें लोकगीत, लोक-गाथा, लोक-कथाओं तथा लोकनाट्य के मूल तत्त्वों का सन्निवेश करने का प्रयास हुआ है। प्रस्तुत ग्रन्थ को तीन खण्डों में विभाजित किया गया है— साहित्य, सिद्धान्त और संस्कृति। साहित्य वाले खण्ड में लोक-साहित्य के संकलन की कठिनाइयों तथा पद्धति का उल्लेख करते हुए लोक-साहित्य संग्रहों की योग्यता का वर्णन किया गया है। सिद्धान्त खण्ड के अन्तर्गत लोक-गीत, लोकगाथा, लोक-कथा, लोक-नाट्य के मूल-तत्त्वों एवं उनकी प्रधान विशेषताओं का विवरण है। संस्कृति वाले खण्ड में लोक-साहित्य में लोकसंस्कृति का जैसा चित्रण उपलब्ध होता है उसका सजीव चित्रण उपस्थित करने का प्रयास हुआ है। लोक-साहित्य के सामान्य सिद्धान्तों का सम्यक् विवेचन प्रस्तुत करनेवाला यह सर्वप्रथम मौलिक ग्रन्थ है। लोक-साहित्य के वर्गीकरण की पद्धति, उसका विस्तार, लोक-काव्य और अलंकृत काव्य में भेद, लोक-गाथाओं की विशेषताएँ तथा लोक-कथाओं के मूल तत्व, लोकोक्तयों और मुहावरों का महत्त्व, बच्चों के खेल, पालने के गीत और मृत्यु सम्बन्धी गीत इत्यादि जितने भी विषय लोक-साहित्य में अन्तर्भुक्त होते हैं उन सभी विषयों और समस्याओं का समाधान इस ग्रन्थ में किया गया है। इस सम्बन्ध में पाश्चात्य देशों में जो अनुसन्धान हुआ है उसका अध्ययन कर उन पश्चिमी मनीषियों के मतों का भी प्रतिपादन यथास्थान वर्णित है। इस पुस्तक के प्रणयन में लेखक ने तुलनात्मक दृष्टि से काम लिया है। भारतवर्ष में जो गीत प्रचलित है उसी कोटि का यदि कोई गीत अंग्रेजी साहित्य में उपलब्ध होता है तो उसे भी उद्धृत किया गया है। पालने के गीत, मृत्यु-गीत तथा आवृत्तिमूलक टेक पदों के अध्याय में इस पद्धति का विशेष रूप से अवलम्बन हुआ है। पाद-टिप्पणियों में अंग्रेजी के मूल ग्रन्थों से प्रचुर रूप में उद्धरण दिये गये हैं। इस पुस्तक की प्रामाणिकता के लिए ऐसा करना आवश्यक समझा गया।

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    Krishnadev Upadhyay

    डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय

    जन्म : उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के सोनवर्सा नामक गाँव में सन 1910 ई. में ।

    शिक्षा : प्रारंभिक शिक्षा ग्रामीण पाठशाला में । माध्यमिक शिक्षा बलिया में तथा उच्च शिक्षा कशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में । एम्. ए. (हिंदी), एम्.ए. (संस्कृत), पी-एच.डी. (हिंदी), साहित्य रत्न ।

    साहित्य सेवा : लोक साहित्य की भूमिका, हिंदी प्रदेश के लोक गीत, भारत में लोक साहित्य, अवधी लोकगीत प्रमुख कृतियाँ हैं ।

    गतिविधियाँ : राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नैनीताल तथा ज्ञानपुर (वाराणसी) में. बीसियों वर्षो तक पी. ई. एस. ग्रेड में हिंदी के प्राध्यापक; काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में यूं.जी.सी. के भुतपूर्व प्रोफेसर ।

    संस्थापक -संचालक; भारतीय लोक-संस्कृति-शोध-संस्थान, वाराणसी । संयोजक; अखिल भारतीय लोक-संस्कृति सम्मलेन, प्रयाग (1958), बम्बई (1959) तथा उज्जैन (1961 ई.) । अखिल भारतीय भोजपुरी सांस्कृतिक सम्मलेन, वाराणसी (1964 तथा 1965 ई.) में क्रमशः मंत्री तथा स्वागताध्यक्ष । यूरोप की तीन बार लोक-सांस्कृतिक यात्रा ।

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