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Loknayak Samarthguru Ramdass

Loknayak Samarthguru Ramdass

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  • Pages: 247p
  • Year: 2002
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 10: 818031006x
  •  
    डॉ. सच्चिदानंद परळीकर ने अत्यंत तटस्थता से और बिना किसी पूर्वाग्रह के समर्थगुरु रामदास का चरित्र प्रस्तुत किया है। इसके पहले लिखी गई समर्थ रामदास की जीवनियों में उनके राजनीतिक संबंधी विचारों एवं कार्य की इतने विस्तार से चर्चा नहीं की गई है। इस ग्रंथ के सातवें अध्याय में समर्थ रामदास के समग्र काव्य का जो सरसरी निगाह से परिचय करा दिया है, वह इस ग्रंथ की एक अनोखी विशेषता मानी जा सकती है। इसके दसवें अध्याय में समर्थ रामदास के समन्वयात्मक दृष्टिकोण की जो सोदाहरण चर्चा की गई है उस प्रकार की चर्चा समर्थ रामदास पर लिखे गए मराठी, अंग्रेजी या हिन्दी के चरित्रग्रंथों में कहीं भी नहीं की गई है। इस चर्चा को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए लेखक ने बहुत ही समीचीन संदर्भ प्रस्तुत किए हैं। आठवें तथा नौवें अध्याय में समर्थ रामदास के भक्तिमार्ग एवं दार्शनिक विचारों का विवेचन करते समय लेखक ने बड़ी खूबी से दिखाया है कि महाराष्ट्र के अन्य संतों के इस विषय में संबंधित विचारों में बहुतांश में मतैक्य पाया जाता है। समर्थभक्त सुनील चिंचोलकर

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    Sachchidanand Parlikar

    डॉ. सच्चिदानंद परळीकर

     जन्मतिथि : 18 जनवरी, 1930

    शैक्षणिक उपलब्धियाँ : एम.ए., पी-एच.डी., साहित्य-रत्न

    34 वर्ष पुणे के प्रसिद्ध फर्ग्युसन महाविद्यालय में हिन्दी विभागाध्यक्ष, स्नातक तथा स्नातकोतर कक्षाओं के प्राचीन तथा आधुनिक हिंदी साहित्य के अध्यापक। पी-एच.डी. तथा पाँच एम्.फिल्. के शोधछात्रों से विविध विषयों पर शोधकार्य करवाया। महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का संचालकपद पंद्रह साल सफलता से सम्हाला और राष्ट्रभाषा के प्रचार में योगदान किया। संचालक पद के कार्यकाल में लगभग दो लाख छात्रों को राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की परीक्षाओं में सम्मिलित कराया। हिन्दी की आजीवन सेवा के लिए महाराष्ट्र राज्य की हिन्दी साहित्य अकादमी के 2002 वर्ष के अनंत गोपाल शेवड़े पुरस्कार से गौरवान्वित। हिन्दी और मराठी में लगभग 200 के ऊपर लेख और 500 के ऊपर व्याख्यान।

    प्रमुख रचनाएँ :

    1. हिन्दी और मराठी के समस्यामूलक उपन्यासों का तुलनात्मक अध्ययन।

    2. बाणभट्ट की आत्मकथा : कुछ विचार एवं अन्य निबंध।

    3. हिंदी के समीक्षात्मक निबंध।

    समर्थ रामदास के प्रति अनन्य भक्ति होने से उनकी जीवनी लिखने की प्रेरणा।

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