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Madhyam Varga Ka Aatmnivedan Ya Gubbaron Ki Roohani Udaan

Madhyam Varga Ka Aatmnivedan Ya Gubbaron Ki Roohani Udaan

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  • Pages: 123p
  • Year: 1997
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171192610
  •  
    विकास और बदलाव के अनेक परिचित पहलू हैं । मसलन उद्योगीकरण, अर्थतंत्र की विश्व-व्यापकता, खुला बाजार नीतियाँ और स्थिर समाज की पेशकश । आर्थिक-सामाजिक -भेद के भी अनेक आयाम हैं । जैसे कि शहर-गाँव, छोटे-बड़े उद्योग, कृषि-उद्योग, जाति-भेद, लिंग-भेद, वर्ग-भेद आदि । जहाँ वाद-विवाद के क्षेत्र और पहलू बहुत विस्तृत हैं, इतना तो स्पष्ट होता जा रहा है कि भविष्य-स्वप्न का आधार-विचारधारा कोई भी हो. उस स्वप्न की संरचना एक ही है-मध्यवर्ग का स्वप्न! इसमें कोई दो राय नहीं कि विकास की पेशकश एक मध्यवर्ग समाज की स्थापना है । इस दृष्टि से मध्यवर्ग परिवेश के सघन विश्लेषण का बड़ा सामाजिक महत्त्व है । इस नाटक का केंद्र और परिधि 'श्रेष्ठ' मध्यवर्गीय परिवार की चारदीवारी है । तिवारी परिवार की परिकल्पना एक सफल. आधुनिक व आदर्श परिवार की है जिसे शिक्षा, गतिशीलता व विकास की अन्य 'सेकुलर इमपल्स' का पूरा लाभ मिला हैं । संपूर्ण नाटकीय कोशिश ऐसे परिवार की 'सीमाएँ' पहचानने, की है । परिवार के सबसे बड़े पुत्र की वास्तविक,-कथित आत्म-हत्या की कोशिश की छाया में परिवारजन एकत्रित हुए हैं । इन परिस्थितियों में उनके आपसी-संबंध-संरचना की गहन छानबीन संभव होती है । नाटक में मुख्य व महत्वपूर्ण प्रयोग यह है कि आपसी रिश्तों का परीक्षण दो स्तरों पर होता चलता है । एक स्तर पर परिवार के सभी सदस्य 'घटना' की छाया में खुद खुलते चलते हैं । साथ ही दूसरे स्तर पर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के जरिये इन संबंधों की सीमा-पराकाष्ठा-अंतिमता को भी परखा जाता है । अंतिम अंक में एक फंटासी में परिवार के सदस्य अपने आद्यप्रारूप (आर्कटाइप) में भी नजर आते हैं । नाटक में शब्दों का बाहुल्य है । इसका एक मंतव्य है । कई बार नाटक में कहा गया है कि परिवार की 'सत्यता' उसके सुराखों, मौन के अंतरालों में छिपी है । इन अंतरालों को उकेरने की प्रक्रिया में शब्द-बाहुल्य होना अनिवार्यता लगता है । हमारी सामाजिक संरचना में आज भी परिवार की इकाई मुख्य है । इसी चारदीवारी में हमारे 'अर्थ मानव' और 'नैतिक मानव' की बुनियाद रखी जाती है । हाल के वर्षों से देश एक बुनियादी आर्थिक सुधार कार्यक्रम से गुजर रहा है । सुधार और बदलाव की सबसे जरूरी इकाई मानव स्वयं है 1 इसलिए सामयिक इंसान को समझना और भी जरूरी होता जा रहा है । यह नाटक इस दिशा में एक जरूरी .और सामयिक प्रयोग है 1 निश्चित ही रंगकर्म की दृष्टि से यह अनेक दिलचस्प चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है ।

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    Raju Sharma

    जन्म: 1959। दिल्ली विश्वविद्यालय के सेन्ट स्टीपें$स कॉलेज से भौतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर।

    लेखन के अलावा रंगकर्म, फिल्म व फिल्म-स्क्रिप्ट लेखन में विशेष रुचि व रुझान।

    प्रकाशित कृतियाँ

    उपन्यास: हलफ़नामे

    कहानी-संग्रह: शब्दों का खाकरोब, समय के शरणार्थी

    नाटक: भुवनपति, मध्यम वर्ग का आत्मनिवेदन या गुब्बारों की रूहानी उड़ान

    नेकरा सो व और राज़ (नाटक अनुवाद)

    सम्प्रति: 1982 से भारतीय प्रशासनिक सेवा में कार्यरत।

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