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Madhyayugeen Premakhyan

Madhyayugeen Premakhyan

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  • Pages: 355p
  • Year: 2007
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180311628
  •  
    श्याम मनोहर पाण्डेय की महत्त्वपूर्ण कृति है - मध्ययुगीन-प्रेमाख्यान! जिस समय इस पुस्तक का प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ था, उस समय दाऊद कृत ‘चंदायन’, कुतुबन कृत ‘मृगावती’, ‘कदमराव पदम’ तथा कतिपय अन्य सूफ़ी प्रेमाख्यान प्रकाशित नहीं थे। असूफ़ी प्रेमाख्यानों में दयाल कवि कृत ‘शशिमाला कथा’, पुहुकर कृत ‘रसरतन’ आदि ग्रंथ अप्रकाशित थे। प्रस्तुत संस्करण में इन सबका उपयोग कर लिया गया है। अवधी के विकास में सूफ़ियों ने क्या योगदान किया है, इस सम्बन्ध में इस संस्करण में अधिक विस्तार से विचार किया गया है। पुस्तक के अन्त में एक विशद् ग्रंथ-सूची भी जोड़ दी गयी है, जिनसे सूफ़ी तथा असूफ़ी साहित्य के अनुसंधान-कर्त्ताओं को सुविधा हो सके। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के शब्दों में, ‘‘डॉ. पाण्डेय ने अपना अनुसंधान का काम बड़े परिश्रम के साथ किया है और उसे उपयुक्त रूप प्रदान करने की सफल चेष्टा भी की है। उन्होंने उसके महत्त्वपूर्ण विषय का अध्ययन करते समय यथासम्भव मूल फ़ारसी ग्रन्थों का उपयोग किया है तथा भरसक इस बात की भी चेष्टा की गई है कि कोई बात भ्रमात्मक न रह जाए। जहाँ तक पता है, इस विषय पर अभी तक कोई शोध कार्य नहीं किया गया था और न इतने सम्यक् रूप में विचार करके उसका परिणाम प्रस्तुत किया गया था। यह पुस्तक इस दृष्टि से एक नवीन प्रयास है और इसके साथ-साथ अपने ढंग से एक आदर्श उपस्थित करता है।’’ डॉ. पाण्डेय ने समस्त मूल स्रोतों का मंथन करके जो निष्कर्ष निकाले हैं, वे महत्त्वपूर्ण हैं। इन निष्कर्षांे के सहारे सूफ़ी एवं असूफ़ी प्रेमाख्यानों के अध्ययन के सम्बन्ध में रुचि-सम्पन्न पाठकों को एक नया एवं अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण मिलता है। जैसा कि डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का कथन है, ‘‘डॉ. पाण्डेय का यह शोध ग्रंथ प्रथम कोटि का है। इसमें डॉ. पाण्डेय ने अन्य सम्बन्धित सामग्री के साथ संस्कृत एवं फ़ारसी में प्राप्त सामग्री का भी पूरी तरह उपयोग किया है। फलतः उनके निष्कर्ष बड़े मूल्यवान हैं। निश्चित रूप से यह हिन्दी साहित्य को डॉ. पाण्डेय की महत्त्वपूर्ण देन हैं।’’

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    Dr. Shyam Manohar Pandey

    प्रारम्भिक शिक्षा बलिया में हुई। बी.ए., एम.ए., डी.फिल्. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद। सन् 1962 से 1965 तक शिकागो विश्वविद्यालय में प्राध्यापक। सन् 1965 से 1967 ई. तक अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडियन स्टडीज (फ़िलाडेल्फिया) के सीनियर फेलो। सन् 1968 से 1975 ई. तक लंदन विश्वविद्यालय के ‘स्कूल ऑफ़ ओरियंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़’ में मध्ययुगीन साहित्य के प्राध्यापक। 1976 में शिमला के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी के विज़िटिंग फेलो।

    महत्त्वपूर्ण कृतियाँ:

    सूफ़ी-काव्य विमर्श - आगरा, सन् 1968 ई.।

    सूफ़ी मंसूर हल्लाज की बानी - इलाहाबाद, सन् 1976 ई.।

    लोक महाकाव्य लोरिकी - इलाहाबाद, सन् 1979 ई.।

    लोक महाकाव्य चनैनी - इलाहाबाद, सन् 1982 ई.।

    The Hindi Oral Epic Loriki—(English) Allahabad, 1979.

    The Hindi Oral Epic Chanaini (English) Allahabad, 1982.

    हिन्दी की मान्य शोध-पत्रिकाओं के अतिरिक्त ‘द जर्नल ऑफ दि अमेरिकन ओरियंटल, सोसाइटी’ (अमेरिका), ‘हिस्ट्री ऑफ़ रेलिजन्स’ (शिकागो), ‘बुलटिन ऑफ़ दी ओरियंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज़’ (लंदन), ‘साउथ एशियन रिव्यू’ (लंदन), ‘ओरियंटालिया लावनिसिया पिरियाडिका’ (बेल्जियम) तथा ‘अननाली नेपुल्स’ (इटली) तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में शोध-निबन्ध और समीक्षाएँ।

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