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Main Aur Tum (Raza Pustak Mala)

Main Aur Tum (Raza Pustak Mala)

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  • Pages: 123p
  • Year: 2019, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9789388933766
  •  
    अस्तित्ववादी चिन्तन-सरणी में सामान्यत: सात्र्र-कामू की ही बात की जाती है और आजकल हाइडेग्गर की भी; लेकिन एक कवि-कथाकार के लिए ही नहीं समाज के एकत्व का सपना देखने वालों के लिए भी मार्टिन बूबर का दर्शन शायद अधिक प्रासंगिक है क्योंकि वह मानवीय जीवन के लिए दो बातें अनिवार्य मानते हैं : सहभागिता और पारस्परिकता। अस्तित्ववादी दर्शन में अकेलापन मानव-जाति की यन्त्रणा का मूल स्रोत है। लेकिन बूबर जैसे आस्थावादी अस्तित्ववादी इस अकेलेपन को अनुल्लंघनीय नहीं मानते क्योंकि सहभागिता या संवादात्मकता में उसके अकेलेपन को सम्पन्नता मिलती है। इसे बूबर मैं-तुम की सहभागिता, पारस्परिकता या 'कम्युनियन’ मानते हैं। यह मैं-तुम अन्योन्याश्रित है। सात्र्र जैसे अस्तित्ववादियों के विपरीत बूबर 'मैं’ का 'अन्य’ के साथ सम्बन्ध अनिवार्यतया विरोध या तनाव का नहीं मानते, बल्कि तुम के माध्यम से मैं को सत्य की अनुभूति सम्भव होती है, अन्यथा वह तुम नहीं रहता, वह हो जाता है। यह तुम या 'ममेतर’ व्यक्ति भी है, प्रकृति भी और परम आध्यात्मिक सत्ता भी। 'मम’ और 'ममेतर’ का सम्बन्ध एक-दूसरे में विलीन हो जाने का नहीं, बल्कि 'मैत्री’ का सम्बन्ध है। इसलिए बूबर की आध्यात्मिकता भी समाज-निरपेक्ष नहीं रहती बल्कि इस संसार में ही परम सत्ता या ईश्वर के वास्तविकीकरण के अनुभव में निहित होती है; लौकिक में आध्यात्मिक की यह पहचान कुछ-कुछ शुद्धाद्वैत जैसी लगती है। विश्वास है कि 'आई एण्ड दाऊ’ का यह अनुवाद हिन्दी पाठकों को इस महत्त्वपूर्ण दार्शनिक के चिन्तन को समझने की ओर आकर्षित कर सकेगा। —प्राक्कथन से

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    Martin Buber

    मार्टिन बूबर

    मार्टिन बूबर (फरवरी 1878-13 जून 1965) का जन्म वियना में एक रूढि़वादी यहूदी परिवार हुआ था।

    1902 में बूबर जिओनवादी आन्दोलन की केन्द्रीय पत्रिका डी वेल्ट साप्ताहिक के सम्पादक बन गये, लेकिन उन्होंने बाद में खुद को जिओनवाद के संगठनात्मक कार्यों से बाहर कर लिया। 1923 में बूबर ने अपना प्रसिद्ध निबन्ध आई एण्ड दाऊ लिखा और 1925 में हिब्रू बाइबिल का जर्मन भाषा में अनुवाद शुरू किया। 1930 में वे फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय अम माइन के मानद प्रोफेसर बने और 1930 में एडॉल्फ हिटलर के सत्ता में आने के तुरन्त बाद ही अपने प्रोफेसर पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बूबर ने सेन्ट्रल ऑिफस फॉर ज्यूइश एडल्ट एजुकेशन की स्थापना की, जो तेज़ी से महत्त्वपूर्ण निकाय बन गया क्योंकि जर्मन सरकार ने यहूदियों को सार्वजनिक शिक्षा में भाग लेने से मना कर दिया था। 1938 में बुबेर ने जर्मनी छोड़ दी और यरूशलेम में बस गये। वहाँ हिबू्र विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन कर मानव विज्ञान और परिचयात्मक समाजशास्त्र पर व्याख्यान देने लगे।

    1958 में बुबेर की पत्नी पाउला की मृत्यु हो गयी और 13 जून 1965 को यरूशलेम के ताल्बिये में अपने घर पर मार्टिन बूबर का निधन हो गया।

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