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Man Ke : Soor Ke

Man Ke : Soor Ke

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  • Pages: 111p
  • Year: 1996
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180316449
  •  
    हिन्दी लेखक केशवचन्द्र वर्मा ने पिछले पचास वर्षों के अपने सशक्त लेखन में कितने अछूते विषयों और भिन्न विधाओं में आधुनिक बोध और समकालीन परिवेश को समेटा है—यह देखकर आश्चर्य होता है। हिन्दी में हास्य व्यंग्य की विधा को साहित्यिक प्रतिष्ठा दिलाने में अग्रणी केशव जी के व्यंग्य उपन्यास, निबंध, कथा कहानी, कविता संकलन जितना चर्चित हुए—उतना ही उनकी नाट्य कृतियाँ, संस्कृति की नई पहचान कराती रचनाएँ—'उज्जवल नील रसà ओर 'समर्थरतिà जैसी गंभीर काव्य कृतियाँ तथा संगीत के सौन्दर्य पक्ष को श्रोताओं और पाठकों के लिए सुलभ कराती पुस्तकें हिन्दी साहित्य की अक्षयनिधि बन चुकी हैं। उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए अनेक सम्मान उन्हें मिले। 'छायानटà जैसी ललित कलाओं की पत्रिका का दस वर्षों तक उ.प्र. संगीत नाटक एकेडेमी के लिए संचालन और सम्पादन किया। केशव जी की संगीत विधयक अन्य कृतियाँ—'कोशिश : संगीत समझने कीà तथा 'राग और रस के बहाने' एवं 'शब्द की साखà (रेडियो शिल्प)। —केशव ने कितना शोध किया होगा—पुराणों का अध्ययन, संगीतशास्त्र के दुर्लभ ग्रंथों का पारायण, भारतीय इतिहास के विभिन्न कालों में से संगीतज्ञों के बारे में यदाकदा मिलने वाले संदर्भों का संकलन और कभी लोक प्रचलित किन्तु अब धीरे-धीरे विस्मृत होती जाती किम्बदंतियों का पुनरुद्धार—वास्तव में उनका यह कृतित्व आश्चर्यचकित कर देता है। इतना ही होता तो वह बड़ी उपलब्धि होती—पर इस बड़ी उपलब्धि का अनूठापन यह है कि इन कथाओं की शैली न तो कहीं बोझिल है और न कहीं शास्त्रज्ञान का आत्मप्रदर्शन! रचनाकार सहज, सरल रसमय विषय क अंतर्निहित-रसधारा में स्वयम् सहज भाव से बहता जाता है और अपने पाठक को भी अपने साथ बहा ले जाता है... धर्मवीर भारती (इस पुस्तक के आमुख से)

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    Keshavchandra Verma

    केशवचन्द्र वर्मा

    हिंदी साहित्य जगत में संभवतः श्री केशवचन्द्र वर्मा उन अकेले लोगों में हैं जिन्होंने अनेक विधाओं में भरपूर कुचलता के साथ अपनी लेखनी चलाई है | जिस अनुशासन के साथ उन्होंने हिंदी का व्यंग्य साहित्य - कथा, निबंध, उपन्यास, नाटक सभी क्षेत्रों में बहुचर्चित कृतियाँ बड़े सहस के साथ प्रस्तुत किन, जैसा उन्होंने संगीत के बारे में नए ढंग और शैल्यों में लिखा, वह सब देखने वाले अचरज में पद जाते हैं | उनकी कविताएँ एक अलग रस की अनुभूति कराती हैं | परिमल जैसी साहित्यिक संस्था गठित करके उसको पच्चीस तीस साल चलाने के बाद अब वे इस बात के अधिकारी हैं कि वे परिमल का प्रमाणिक इतिहास लिख कर तमाम अनर्गल भ्रमो को दूर करने का दायित्व उठाएँ | केशव जी की अब तक पचास से ऊपर कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं उन सब का नामोल्लेख करना यहाँ अनावश्यक है |

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