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Mati Mati Arkati

Mati Mati Arkati

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  • Pages: 260
  • Year: 2016, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183618021
  •  
    ब्रिटिश उपनिवेश द्वारा भारत से बाहर ले जाए गए मज़दूरों को तत्कालीन कंपनियां और उनके एजेंट दो नामों से पुकारते थे। दक्षिण भारत, बिहार और प. उत्तर प्रदेश के गैर-आदिवासी मज़दूरों को 'कुली' और झारखंड के सदान और आदिवासियों को 'हिल कुली', 'धांगर' और 'कोल' कहा जाता था। ये और कोई नहीं ग्रेटर झारखंड की उरांव, मुंडा, संताल, खडिय़ा और सदान जातियां थीं। ब्रिटिश संसद और ब्रिटिश उपनिवेशों में मौजूद दस्तावेज़ों में झारखंड के आदिवासियों के आप्रवासन के ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं। कालांतर में मॉरीशस, गयाना, फिजी, सूरीनाम, टुबैगो सहित अन्य कैरीबियन तथा लेटिन अमेरिकी और अफ्रीकी देशों में लगभग डेढ़ सदी पहले ले जाए गए $गैर-आदिवासी गिरमिटिया मज़दूरों ने बेशक लम्बे संघर्ष के बाद इन देशों को भोजपुरी बना दिया है और वहां के नीति-नियंताओं में शामिल हो गए हैं। लेकिन सवाल है कि वे हज़ारों झारखंडी जो सबसे पहले वहां पहुंचे थे कहां चले गए? कैसे और कब वे गिरमिटिया कुलियों की नवनिर्मित भोजपुरी दुनिया से $गायब हो गए? ऐसा क्यों हुआ कि गिरमिटिया कुली खुद तो आज़ादी पा गए लेकिन उनकी आज़ादी हिल कुलियों को चुपचाप गड़प कर गई। एक कुली की आज़ादी कैसे दूसरे कुली के खात्मे का सबब बनी? क्या थोड़े आर्थिक संसाधन जुटते ही उनमें बहुसंख्यक धार्मिक और नस्ली वर्चस्व का विषधर दोबारा जाग गया और वहां उस अनजान धरती पर फिर से ब्राह्मण, क्षत्रिय, भूमिहार और वैश्य पैदा हो गए? सो भी इतनी समझदारी के साथ कि 'शूद्र' को नई सामाजिक संरचना में जन्मने ही नहीं दिया? इस उपन्यास का मूल प्रश्न यही है। कोंता और कुंती की इस कहानी को कहने के पीछे लेखक का उद्देश्य पूरब और पश्चिम दोनों के गैर-आदिवासी समाजों में मौजूद नस्ली और ब्राह्मणवादी चरित्र को उजागर करना है जिसे विकसित सभ्यताओं की बौद्धिक दार्शनिकता के ज़रिए अनदेखा किया जाता रहा है।

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    Ashwini Kumar Pankaj

    अश्विनी कुमार पंकज

    1964 में जन्म । डॉ. एम.एस. 'अवधेश' और स्मृतिशेष कमला के सात संतानों में से एक कला स्नातकोत्तर ।

    1991 से जिन्दगी और सृजन के मोर्चे पर वन्दना टेटे की सहभागिता । पिछले तीन दशकों से अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों-रंगकर्म, कविता-कहानी, आलोचना, पत्रकारिता, डाक्यूमेंटरी, प्रिंट और वेब में रचनात्मक उपस्थिति । झारखंड एवं राजस्थान के अन्दिवासी जीवनदर्शन, समाज, भाषा-संस्कृति और इतिहास पर विशेष कार्य ।

    उलगुलान संगीत नाट्य दल, राँची के संस्थापक संगठक सदस्य । 1987 में रंगमंचीय त्रैमासिक पत्रिका ‘विदेशिया’ (राँची) का प्रकाशन-संपादन; 1995 में भाकपा-माले राजस्थान के मुखपत्र ‘हाका’, 2006 में राँची से लोकप्रिय मासिक नागपुरी पत्रिका ‘जोहार सहिया’ और पाक्षिक बहुभाषी अखबार ‘जोहार दिसुम खबर’ का सम्पादन; फिलवक्त रंगमंच एवं प्रदर्श्यकारी कलाओं को त्रैमासिक पत्रिका ‘रंगवार्ता’ और बहुभाषायी त्रैमासिक पत्रिका ‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखडा’ के प्रकाशन से सम्बद्ध ।

    प्रकाशित पुस्तके : पेनाल्टी कॉर्नर, इसी सदी के असुर, सालो, अथ दुडगम असुर हत्या कथा (कहानी-संग्रह); जो मिटटी की नमी जानते हैं, ख़ामोशी का अर्थ पराजय नहीं होता (कविता-संग्रह), युद्ध और प्रेम, भाषा कर रही है दावा (लम्बी कविता); छाँइह में रउद (दुष्यंत कुमार की ग़जलों का नागपुरी अनुवाद); एक अराष्ट्रीय वक्तव्य (विचार); नागपुरी साहित कर इतिहास (भाषा साहित्य), रंग-बिदेसिया (भिखारी ठाकुर पर, सं.), उपनिवेशवाद और आदिवासी संघर्ष (सम्पादित), मरड गोमके जयपाल सिंह मुंडा (जीवनी), माटी माटी अरकाटी (उपन्यास), आदिवासीडम (सं.) और प्राथमिक आदिवासी विमर्श (सं.) प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें ।

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