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Mere Samay Ke Saath

Mere Samay Ke Saath

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  • Pages: 95p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: MSKS
  •  
    अपने तीसरे काव्य-संग्रह अपना वजूद के प्रकाशन के साथ ही श्यामपलट पांडेय ने समकालीन हिन्दी कविता में एक महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज़ की है। इस चौथे काव्य-संग्रह मेरे समय के साथ में शामिल कविताएँ उन्हें उत्तर-आधुनिक दौर के कवि के रूप में एक विशेष पहचान प्रदान करती हैं। इस संग्रह की कविताओं में मनुष्य के स्वप्न एवं यथार्थ के मध्य की कठिन भूमि बार-बार उपस्थित होती है। मूल्यों के तेजी से होते क्षरण को लेकर उपजी बेचैनी और उन्हें बचाए रखने की विकलता इन कविताओं में बार-बार लक्षित की जा सकती है। इन कविताओं में एक देशज नॉस्टेल्जिया पूरी सृजनात्मक ऊँचाई तक पहुँचती है, जो जीवन के बीच से जीवन के पार तक ले जाती है। कविताओं के पार्श्व में मिट्टी की महक और लय के साथ एक लोक-ध्वनि बराबर बजती रहती है। अपने जातीय अनुभव-बोध की जमीन से उपजे अचिद्दित शब्दों को उठाकर नई या अद्भुत अर्थछवियाँ गढ़ना बहुत कम सम्भव हो पाता है। इस संग्रह की अनेक कविताएँ ऐसी ही अद्भुत अर्थछवियों के उजास से आलोकित हैं। भाषा की ताज़गी लिये एक नया शिल्प बुनती ये कविताएँ कवि की घनीभूत संवेदना के साथ एकाकार हो जाती हैं। कवि अपने वस्तु-विन्यास या कविता की संरचना के प्रति पिछले संग्रहों की अपेक्षा अधिक सजग है और इसीलिए इन कविताओं का कसा हुआ शिल्प-सौष्ठव एक अलग जगमगाहट बिखेरता है। इन कविताओं में गाँव और शहर एक साथ उपस्थित होते हैं। अन्तर्विरोध एवं द्वन्द्व को उभारती तथा आसपास की हलचल को उकेरती इन कविताओं की गूँज पाठक के मन में बहुत दिनों तक छाई रहती है।

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    Shyampalat Pandey

    जन्म: 15 फरवरी, 1949, जामों, सुलतानपुर (उ.प्र.)

    शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी साहित्य), 1969, लखनऊ विश्व- विद्यालय, लखनऊ, प्रथम श्रेणी तथा प्रथम स्थान के साथ, एल.एल.बी., 2007, गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद।

    विशेष रुचि: सम्पूर्ण भारत का कई बार भ्रमण। गढ़वाल, कुमाऊँ (उत्तरांचल), हिमाचल प्रदेश तथा गुजरात के अपरिचित आदिवासी अंचलों में दूर-दूर तक कई बार भ्रमण।

    व्यवसाय: 1969 से 1972 तक शिक्षण कार्य, 1974: उत्तर प्रदेश सिविल सेवा में डिप्टी कलेक्टर, 1974 से भारतीय राजस्व सेवा में।

    प्रकाशित कृतियाँ: अँधेरे से अँधेरा काटता हूँ, 1987; धूप आज फिर उतरी है, 1995; ज्ीम श्रनदहसम व िैबतमंउे ंदक व्जीमत च्वमउेए (काव्य संग्रह); 35 हिन्दी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद, 2001; पूर्वोत्तर भारत में बहुचर्चित एवं हिन्दी तथा अंग्रेजी के वरिष्ठ कथाशिल्पी, समीक्षक, निबन्धकार एवं अनुवादक प्रो. उदयभानु पांडेय द्वारा अनूदित सेउरर अरन्य; (काव्य संग्रह); 45 हिन्दी कविताओं का पूर्वांचल के अग्रगण्य अनुवादक, सुपरिचित पत्रकार, कवि, जीवनीकार एवं कथाकार श्री दिनकर कुमार द्वारा असमिया भाषा में अनुवाद; अपना वजूद, 39 हिन्दी कविताओं का तीसरा संग्रह, 2003

    सम्मान: अपना वजूद के लिए ‘घनश्यामदास सर्राफ साहित्य पुरस्कार’ योजना के अन्तर्गत हिन्दी भाषा के प्रतिष्ठित सम्मान ‘सर्वोत्तम साहित्य पुरस्कार-2003’ से सम्मानित।

    संपर्क: 907, पंचतीर्थ अपार्टमेंट, जोधपुर चार रास्ता, सेटेलाइट, अहमदाबाद-380015; फोन-9427310604

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