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  • Pages: 143P
  • Year: 2011
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183614306
  •  
    आदि काल से भारतीय समाज में कोढ़ की तरह फैली अस्पृश्यता की समस्या पर एक नए नजरिये से लिखा गया उपन्यास। स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय संविधान में इस सामाजिक अवरोध से समाज को विमुक्त करने का प्रयास किया गया पर वैधानिक उपायों का समाज में व्यावहारिक अनुपालन नहीं हो सका। यह उपन्यास जाति-प्रथा की वर्तमान अवस्थिति को रेखांकित करते हुए इसके अतीत पर भी दृष्टिपात करता है जब सत्ताधारी समाज ने सवर्ण-अवर्ण की लक्ष्मण-रेखाएँ बनाकर मानवीय संवेदनाओं का तिरस्कार किया, अपने ही जैसी चमड़ी और खून वाले व्यक्ति के साथ पाशविक व्यवहार किया और असंख्य लोगों को नारकीय जीवन जीने को विवश किया। उपन्यास की कहानी में शोषित समाज के एक युवक का उपयोग उच्चवर्ण द्वारा अपना वंश बढ़ाने के लिए किया जाता है लेकिन उससे मिलती-जुलती मुखाकृति वाली संतान पैदा होने पर शोषक समाज उसे लोक-लज्जा से भयभीत होकर समाप्त करने की साजिश में जुट जाता है। उपन्यास अतीत और वर्तमान की एक कड़ी के रूप में सामने आता है और सवाल उठाता है कि कानून की बंदिशों के बावजूद क्या यह सामाजिक बुराई समाप्त हो पाई? क्या संस्कारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी घोली गई इस घृणा से समाज विमुक्त हो पाया? वर्तमान महानगरीय संस्कृति में अब जाति का कितना महत्त्व रह गया है और वर्तमान ग्रामीण समाज में क्या जाति ने कोई नया रूप लिया है? एक और सवाल जिस पर यह उपन्यास फोकस करता है, वह है स्थानान्तरण - अपनी मूलभूमि को छोड़कर कहीं और जाकर सिर छिपाना। कहने की जरूरत नहीं कि यह भी हमारे वर्तमान की एक ज्वलन्त समस्या है। कह सकते हैं कि तमाम सवालों के बीच इस उपन्यास में यह सवाल बराबर मौजूद रहता है। यह औपन्यासिक कृति पाठकों को निश्चय ही इन सभी सवालों से दो-चार होने को प्रेरित करेगी।

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    Dalpat Chauhan

    दलपत चौहान

    शिक्षा: बी.ए. अर्थशास्त्र (1964)।

    गुजराती दलित साहित्य के चखचत स्वर

    प्रकाशित कृतियाँ - काव्य-संग्रह: ‘तो पछी क्याँ छे सूरज?’ (श्रेष्ठ पुस्तक पारितोषिक गुजरात साहित्य अकादमी, 2000)। उपन्यास: ‘मुलक’, ‘गिठठ’ (सन्तोक बा सुवर्ण चंद्रक, 2000), भरभांखलुं। कहानी-संग्रह: ‘मूंझ्ाारो’। नाटक-संग्रह: ‘अनार्यावर्त’ (अखिल भारतीय रेडियो नाट्य लेखन प्रतियोगिता पुरस्कार - 1987/1989-1990, श्रेष्ठ पुस्तक पारितोषिक गुजरात साहित्य अकादमी - 2000), ‘हरिफाई’ (गुजराती साहित्य परिषद पारितोषिक - 1998-99), कवि नरसिंह महेता दलित साहित्य अवार्ड (गुजरात सरकार - 2001-2002)।

    सम्पादन: दूंदूभी, वणबोटी वार्ताओ।

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