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  • Pages: 92
  • Year: 2016, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183617796
  •  
    धीमी आंच पर धरती की मोटी सतह के भीतर हलके-हलके खदबदाता कुछ-फट पड़ने की तरफ एक-एक कदम रखता हुआ ! रवीन्द्र भारती की इन कविताओं की तुलना में अगर कोई बिम्ब गढ़ना चाहें तो वह कुछ ऐसा होगा ! जो मन इन कविताओं में न्यस्त है ! यह मुंडेर पर खड़ा चीखता हुआ मन नहीं है, यह गली के कोलाहल को परत-परत छील चूका और उसके परदे में छिपी तमाम मामूलियत को पहचान चूका मन है, और अब बदलाव को उतनी ही गहराई और सच्चाई से शुरू होते देखना चाहता है जितने गहरे उसकी बेचैनी खदबदा रही है ! बिलकुल हमारे आसपास के संदर्भो में एकदम सहज तत्वों और तथ्यों को वे तिनके की तरह उठाते हैं, एक दुर्लभ शांत तन्मयता के साथ इशारों में ही उनको स्पर्श करते हैं, और हमें मालूम भी नहीं होता कि हमारी सोई संवेदना कतई भिन्न-आलोक में जाग पड़ती है !उनकी कविताओं में प्रतीकों का एक अनंत विस्तार है जिसकी पहुँच प्रकृति, अन्तरिक्ष और सृष्टि के आदि-अंत तक है! ये कविताएँ हमें कभी बहुत ऊँचे से, लगभग किसी सिद्ध भिक्षु की तरह संबोधित करती हैं और कभी ठीक हमारे सामने आकर किसी संगी-साथी की तरह, ऐसा साथी जो हमसे ज्यादा अक्लमंद है लेकिन उस अक्लमंदी को भी जिसने अपनी अर्जित अनाक्रमकता की पवित्र तहों में कहीं पिरो लिया है ! इस नजरिए से वे अब भी एक ताजा कवी हैं, जो हमें हमारे अभ्यस्त पुरानेपन की जद से बाहर ले जाते हैं और चीजों को देखने की नई दृष्टि देते हैं जिससे हमारा आंतरिक स्पेस रचनात्मक हो उठता है ! कहना होगा कि हिंदी कविता के कुछ तत्व जो बहुप्रतीक्षित थे, इन कविताओं में प्रकट होते हैं !

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    Ravindra Bharti

    जन्म: 1951

    कविता-संग्रह : जड़ों की आखिरी पकड़ तक, धूप के और करीब, यह मेरा ही अंश है, नचनिया !

    कविताएँ कई भाषाओँ में अनूदित !

    नाटक : कंपनी उस्ताद, फूकन का सुथन्ना, जनवासा, अगिन तिरिया अरु कौआहंकनी (फिल्म निर्माण) !सम्मान और पुरस्कार : बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् से विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान, मानव संसाधन मत्रालय, भारत सरकार से सीनियर फेलोशिप !

    1975 में आपातकाल के दौरान कविता पर कारावास !

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