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Nakshtraheen Samay Mein

Nakshtraheen Samay Mein

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  • Pages: 128
  • Year: 2016, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126728220
  •  
    Digital Edition Available Instantly on Pajkamal Books Library on
    अशोक वाजपेयी का यह पन्द्रहवाँ कविता-संग्रह उनके पहले कविता-संग्रह के प्रकाशन के 50वें वर्ष में प्रकाशित हो रहा है। अपनी कविता के मूल स्वर और सरोकार पर अड़े रहे इस कवि ने हर बार अपनी कविता के संसार में कुछ ऐसा शामिल किया, खोजा है जो पहले नहीं था। इस बार समकालीन राजनीति में जो उथल-पुथल हुई है उसके प्रतिरोध के रूप में उनकी कविता खड़ी हुई है। टेढ़ेपन पर अटल भरोसा रखने वाले कवि ने इसमें कुछ सपाटबयानी भी की है। इस सबके बावजूद होने का अवसाद, गहरा आत्मालोचन और अदम्य जिजीविषा सब कुछ यहाँ एक साथ है। सयानापन और जि़म्मेदारी, शब्द और शिल्प से कुछ खिलवाड़ तथा रोज़मर्रा की जि़न्दगी का सहज अध्यात्म फिर चरितार्थ है।

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    Ashok Vajpeyi

    1970 में अपने निबंध-संग्रह 'फ़िलहाल' से हिंदी में आलोचना-प्रवेश करनेवाले कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी लगभग एक अधसदी से कविता, साहित्य, संस्कृति, संगीत, रूपंकर कलाओं आदि पर हिंदी और अंग्रेजी में आलोचना लिखते रहे हैं ! उन्होंने आलोचना की भाषा को नई ताजगी और सूक्ष्मता देने के साथ-साथ उसे सामाजिक संवाद का हिस्सा बनाने में सार्थक भूमिका निभाई है !

    उनकी प्रकाशित आलोचना पुस्तकों में 'फ़िलहाल', 'कुछ पूर्वग्रह', 'कविता का गल्प', 'सीढियां शुरू हो गई हैं', 'कभी-कभार', 'यहाँ से वहां' , 'कुछ खोजते हुए', 'पुनर्भव', 'समय से बाहर' आदि शामिल हैं !

    अशोक वाजपेयी को साहित्य अकादेमी पुरस्कार (जो उन्हें 1994 में मिला उसे बढती असहिष्णुता के विरोध में 2015 में लौटा दिया), दयावती मोदी कविशेखर सम्मान, कबीर सम्मान, समन्वय भाषा सम्मान आदि से अलंकृत किया गया है ! फ्रेंच और पोलिश सरकारों ने उन्हें उच्च नागरिक सम्मान दिए हैं ! 2011 में उन्होंने उत्तर प्रदेश सर्कार का भारत भारती पुरस्कार विरोधस्वरुप स्वीकार नहीं किया था !

    वे 35 वर्ष भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे ! महात्मा गाँधी अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के सस्थापक-कुलपति, केन्द्रीय ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष रहे हैं और इन दिनों रजा फाउंडेशन के प्रबंध-न्यासी हैं ! वे भारत भवन न्यास के संस्थापक न्यासी सचिव और अध्यक्ष भी रहे हैं ! हिंदी आलोचना की पत्रिका 'पूर्वग्रह' का उन्होंने लगभग 16 वर्षों तक संपादन किया !

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