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Nanak Vani

Nanak Vani

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  • Pages: 743p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180312113
  •  
    नानक वाणी में धार्मिक, लौकिक और लौकिक-धार्मिक काव्य का सहज समन्वय है । इसमें कर्ममार्ग, योगमार्ग, भक्तिमार्ग और ज्ञानमार्ग का विशद निरूपण है । नानक वाणी में शान्त, शृंगार, करुण, वीर, हास्य आदि रसों का अद्‌भुत् पारिपाक है । उनका प्रकृति चित्रण अत्यन्त मोहक और आकर्षक है । उनकी भाषा पूर्वी-पंजाबी है परन्तु उसमें ब्रजभाषा और खड़ी बोली का भी पुट है । मुहावरों और कहावतों का प्रचुर प्रयोग है । नानक के अनुसार परमात्मा एक है वह कर्तार है, वह भय से रहित है, बैर से रहित है, मूर्तिमान है, काल से रहित है, योनि के अन्तर्गत नहीं आता । नानक वाणी में जहाँ एक ओर गुरु गाम्भीर्य और ज्ञान-वैराग्य भक्ति का अमृत मंथन है वहाँ उनकी भाषा में अद्‌भुत् ओज और भक्ति है । उनकी रचना शैली में काव्य का लालित्य, माधुर्य, विचार सम्पन्नता सब कुछ है । नानक वाणी हृदय और मस्तिष्क को स्पर्श ही नहीं करती प्रत्युत उन्हे अनप्राणित भी करती है । हिन्दी में प्रथम बार नानक की सम्पूर्ण वाणी का संकलन एवं भाषानुवाद के साथ प्रकाशन । नानक वाणी में उन्नीस राग प्रयुक्त हुए हैं- राग श्री, माझ, गौरी, आसा, गुजरी, वडहंस, सोरठि, धनासिरी, तिलंग, सूही, बिलावल, रामकली, मारू, दुखारी, भैरउ, बसंत, सागर, मलार तथा प्रभाती । नानक वाणी संगीतमय है, विचारोत्तेजक है । नानक वाणी का यह राज-संस्करण अपनी विशद् सारगर्भित भूमिका के कारण अधिक सुबोध और उपयोगी हो गया है । श्री गुरु नानक देव की सम्पूर्ण वाणी का यह मूल्यवान संग्रह उनके सभी भक्तों और प्रेमियों के पास अवश्य होना चाहिए ।

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    Jairam Mishra

    डॉ. जयराम मिश्र
    डॉ. जयराम मिश्र का जन्म सन् 1915 में मुकुन्दपुर, जिला इलाहाबाद में हुआ था । पिता एवं आध्यात्मिक गुरु आत्मज विभूति पं. रामचन्द्र मिश्र ।
    एम.ए., एम-एड, पी-एच.डी., उपाधियाँ प्राप्त करने के उपरांत हिन्दी संस्कृत, अंग्रेजी के साथ-साथ बॉगला और पंजाबी भाषा-साहित्य का गहन
    अध्ययन किया तथा उनके अनेक ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद किया ।
    युवावस्था में स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय रहे । सन् 1942 के आन्दोलन में भाग लेने पर राजद्रोह का मुकदमा चला और छह वर्ष का कारावास भोगा । जेल
    में रहकर आध्यात्मिक ग्रन्थों-गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आदि का गहन चिन्तन-मनन किया फलत: दिव्य आध्यात्मिक अनुभूतियाँ प्राप्त कीं ।
    इलाहाबाद डिग्री कॉलेज में अध्यापन करते हुए अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया ।
    'श्री गुरुग्रन्थ-दर्शन' तथा 'नानक वाणी' कृतियों ने हिन्दी तथा पंजाबी में स्थायी प्रतिष्ठा प्रदान कीं। जीवनी-ग्रन्थों जैसे गुरु नानक, स्वामी रामतीर्थ, आदि गुरु शंकराचार्य, मर्यादापुरुषोत्तम भगवान राम, लीलापुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण, शक्तिपुज हनुमान ने अपनी कथात्मक ललित शैली, सहज भाषा-प्रवाह तथा स्वयं एक सन्त की लेखनी से प्रणीत होने के कारण अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की ।
    नैतिक ब्रह्मचारी डॉ. मिश्र मूलत: आत्मस्वरुप में स्थित उच्चकोटि के सन्त और धार्मिक विभूति थे । एषणाविहीन, निरन्तर नामजप एवं नित्य चैतान्यमृत, निरन्तर नामजप एवं नित्य चैतान्यमृत में लीन, परम लक्ष्य संकल्पित उनका जीवन आज के युग में एक दुर्लभ उदाहरण है ।
    डॉ. जयराम मिश्र सन् 1987 में पंचतत्व में विलीन हो गये ।
    

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