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Nemichandras Jain

Nemichandras Jain

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  • Pages: 128p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788181970244
  •  
    स्वतन्त्रचेता रंगचिन्तक, आलोचक और कवि नेमिचन्द्र जैन के बारे में यह पुस्तक उन ‘कृतित्व और व्यक्तित्व’ नुमा पुस्तकों से बिल्कुल अलग है जो अक्सर हमें देखने को मिलती हैं। यह शोध पुस्तक भी नहीं है, और इसमें जो तथ्य भी आए हैं, वे किसी श्रद्धावनत महत्त्वाकांक्षी विद्यार्थी की ‘खोज’ से नहीं, एक लम्बे सहज लेकिन सजग साहचर्य से प्राप्त हुए हैं। नाटककार, चिन्तक मुद्राराक्षस ने नेमिजी के साथ अपने लगभग चार दशक लम्बे परिचय, सम्पर्क और संवाद के आधार पर जिस रूप में उन्हें पाया, समझा और वस्तुगत तटस्थता के साथ विश्लेषित-व्याख्यायित किया वही इस पुस्तक की विषयवस्तु है। नेमिजी की वैचारिक प्रतिबद्धताएँ, उनके व्यक्तिगत जीवन की छवियाँ, उनका बौद्धिक-साहित्यिक विकासक्रम, और रंगमंच से सम्बन्धित उनके व्यापक तथा ऐतिहासिक महत्त्व के काम को यहाँ गहरी संलग्नता और स्पष्टता के साथ विवेचित किया गया है। मुद्रा जी के शब्दों में: ‘‘रंगालोचना के क्षेत्र में उन्होंने बहुत लम्बा और गहरा काम किया। हिन्दी में उन्होंने वह काम किया जो अंग्रेजी में केनेथा टाइनन ने किया था।...लेकिन अपने काम से जितना ज्यादा वे असंपृक्त रहे शायद ही कोई दूसरा वैसा मिले। अपने ही कृतित्व के प्रति अजनबी भाव उन्हें अपने आपका मूल्यांकन करते जाने की जिस क्षमता से सज्जित करता था वह इस बात की गारंटी होता था कि उनका लिखा अन्तिम है।’’ कहने की आवश्यकता नहीं कि मुद्राजी की लेखनी का तेवर, इसका एक विशेष आकर्षण है, जो नेमिजी के साथ-साथ उस दौर, उस समय के साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश, व्यक्तियों और प्रतीकों पर भी दृष्टिपात करती चलती है।

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    Mudra Rakshak

    जन्म: 21 जून, 1933, बेहटा गाँव, लखनऊ।

    1955 से 1960 तक कलकत्ता में पत्रकारिता। 1963 से आकाशवाणी दिल्ली में नौकरी। 1976 में इस्तीफा देकर लखनऊ में रहते हुए स्वतंत्र लेखन। नाटक के क्षेत्र में अनेक नाटकों का निर्देशन। अन्य ललित-रूपंकर कलाओं में गहरी रुचि।

    अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और राजनीति के विषयों के विख्यात टिप्पणीकार। समाज-राजनीतिक मुद्दों पर आन्दोलनों में व्यापक भागीदारी।

    उपन्यास, नाटक, कहानी, व्यंग्य, आलोचना आदि की लगभग 40 पुस्तकें प्रकाशित।

    अनेक रचनाएँ अन्य भाषाओं में अनूदित।

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