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Nirala Sahitya Mein Pratirodh Ke Swar

Nirala Sahitya Mein Pratirodh Ke Swar

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  • Pages: 383p
  • Year: 2010
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180314001
  •  
    प्रस्तुत पुस्तक प्रतिरोध की संस्कृति के ऐतिहासिक विकासक्रम में निराला की प्रतिरोधी चेतना को उनके समग्र रचनात्मक जगत में चिन्हित करती है । कहना न होगा कि निराला के साहित्य की गहरी समझ और साफ-सुथरी वैचारिकी के नाते अनायास ही यह किताब रामविलास जी का स्मरण कराती है । रामविलास जी के प्रभाव के बतौर हम देखते हैं कि यह किताब, जीवन-संघर्ष और रचना दोनों के जटिल अंतर्द्वद्वों रिश्तों को समझते हुए आगे बढ़ती है । निराला की कविताओं पर काफी काम हुए हैं पर विवेक यहां निराला के कविता-संसार में अन्य पहलुओं के साथ ही दलित और स्त्री अस्मिताओं की महत्वपूर्ण शिनाख्त भी करते हैं । कथा-साहित्य में निराला के उपन्यासों उघैर कहानियों में यथार्थवाद की गहरी समझ को चिन्हित करते हुए विवेक, निराला के गहन समयबोध को निराला के ही शब्दों में रेखांकित करते हैं- ''.. .यह लड़ाई जनता की लड़ाई है और फासिज्म के खिलाफ विजय पाना हमारे और विश्व के कल्याण के लिए जरूरी है । '' निराला की यह चिन्ता आज हमारे लिए और अधिक प्रासंगिक हो जाती है जब विकास और धर्मान्धता साथ-साथ फल-फूल रहे हैं और फासीवादी खतरा एकदम आसन्न है । निराला के शोषण-विरोधी चिंतन पर लिखा गया अंश किताब का बेहतरीन हिस्सा है । विवेक इस हिस्से में निराला के कम चर्चित पर बेहद महत्वपूर्ण लेखों के सहारे उनकी निःशंक साम्राज्यवाद-विरोधी, सामंतवाद-विरोधी दृष्टि पर प्रकाश डालते हैं । अपने समकाल की राजनैतिक हलचलों, वैश्विक स्थितियों और उपनिवेशवादी शासन की गहरी समझ निराला के चिंतनपरक लेखों में मौजूद है । विवेक ने इस पुस्तक में निराला की रचनाओं के नये अस्मिता केंद्रित पाठ पर सवालिया निशान लगाते हुए निराला को उद्‌धृत किया है- ' 'तोड़कर फेंक दीजिए जनेउ जिसकी आज कोई उपयोगिता नहीं । जो बड़प्पन का भ्रम पैदा करता है और सम स्वर से कहिए कि आप उतनी ही मर्यादा रखते हैं जितना आपका नीच से नीच पड़ोसी चमार या भंगी रखता है । '' यह पुस्तक भारतीय आधुनिक साहित्य की शोषणविरोधी परंपरा को बढ़ाने में निराला के योग को बेहतरीन ढंग से रेखांकित करती है । इसे पढ़ना एक विचारोत्तेजक अनुभव से गुजरना है । -मृत्युंजय

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    Vivek Nirala


    जन्म : 30 जून, 1974
    शिक्षा : एम.ए., डी.फिल. (इलाहाबाद  विश्वविद्यालय)।
    रचनाएँ : एक बिम्ब है यह (2005) के बाद यह दूसरा कविता-संग्रह; निराला-साहित्य में दलित चेतना और निराला-साहित्य में प्रतिरोध के स्वर (आलोचना) तथा सम्पूर्ण बाल रचनाएँ : सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' नामक पुस्तक का सम्पादन।
    सम्प्रति : कौशाम्बी जनपद के एक महाविद्यालय में विभागाध्यक्ष।
    सम्पर्क : निराला-निवास, 265 बख्शी खुर्द, दारागंज, इलाहाबाद -211006

    Email : viveknirala@gmail.com

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