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Dil Ki Duniyan

Dil Ki Duniyan

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  • Pages: 111p
  • Year: 2020, 4th Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126718160
  •  
    इस्मत चुगताई भारतीय साहित्य में वो आवाज हैं जिसने अपने ज़माने में बनती हुई प्रगतिशीलता को अपनी कहानियों और उपन्यासों से एक चेहरा दिया, उसे अवाम के समझने और अपनाने लायक बनाया। अपने किरदारों के माध्यम से उन्होंने उस हिम्मत को साकार किया, जो कम-से-कम उनके दौर में तो स्त्रियों के लिए एक दिवास्वप्न ही थी। अपनी कलम की एक-एक जुम्बिश से सौ-सौ जादू जगाने वाली इस्मत चुग़ताई ने अपने इस उपन्यास में समाज की मुर्दा और सड़ी-गली परम्पराओं से आज़ाद होकर 'दिल की दुनिया' आबाद की है-यह एक युवती की कहानी है जिसे शादी के बाद शौहर ने छोड़ दिया था। मज़हब और समाज की ग़लत मान्यताओं के दरमियान जिसे रास्ता न सूझता था लेकिन जिसने अपनी ही जैसी एक बदनसीब ज़िन्दगी से हौसला पाकर अपने चारों तरफ एक आभामंडल बुन दिया। उनका जब जी चाहता, निकल खड़ी होती और जंगलों में इश्किया लोक गीत गाती फिरतीं। उनकी मर्जी को बाले मियाँ की मर्जी और ख़ुदा का हुक्म समझ कर किसी ने चूँ न की। फिर आहिस्ता-आहिस्ता उनके बारे में मोजिज़े मशहूर होने लगे तो और भी लोगों की उनसे कन्नी दबने लगी। वह पूजी जाने लगीं। लोग मियाँ से सिफारिश कराने के लिए उनकी सेवा करते। जिधर निकल जाती आँखें बिछाते। उनका काम करना ख़ुशकिस्मती समझते। जिसकी मुराद पूरी होती वह ग़ाज़ी मियाँ के मज़ार पर चढ़ावा चढ़ाने के साथ उनके लिए भी गुलाबी दुपट्टा और तेल-इत्र फूल और चूड़ियाँ नज़ करता। खाना वह खाती ही कितना थीं। कई-कई दिन भूखी रह लेती थीं। लोग थाल सजा कर उनके घर दे जाते, वह उठा कर फ़क़ीरों को खिला देतीं। माँ-बाप के मरने के बाद वह इसी तरह अकेली रहतीं थीं। एक चमारन घर की देखभाल करती थी। दुनिया भर के कपड़े फाड़ने और खोने वाली धोबन उनके कपड़े सब से उजले धोती थी। थोड़ी बहुत ज़मीन भी थी मगर उन्होंने वुसूली कभी ज़रूरी न समझी। शायद यही वजह थी कि लोग उन्हें गाज़ी मियाँ की प्यारी मानने लगे थे। वह उन्हें भी प्यारी थीं। उन्हें किसी से डरने की ज़रूरत न थी, उन पर जान निछावर करने वाले बहुत थे। इसीलिए वह एक कमज़ोर औरत होते हुए भी अपाहिज और मजबूर नहीं थीं।

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    Ismat Chugtai

    जन्म : 21 जुलाई, 1915, बदायूँ (उत्तर प्रदेश)।

    इस्मत ने निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम तबक़े की दबी-कुचली-सकुचाई और कुम्हलाई लेकिन जवान होती लड़कियों की मनोदशा को उर्दू कहानियों व उपन्यासों में पूरी सच्चाई से बयान किया है।

    इस्मत चुग़ताई पर उनकी मशहूर कहानी लिहाफ़ के लिए लाहौर हाईकोर्ट में मुक़दमा चला, लेकिन ख़ारिज हो गया। गेन्दा उनकी पहली कहानी थी जो 1949 में उर्दू साहित्य की सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका 'साक़ी’ में छपी। उनका पहला उपन्यास जि़द्दी 1941 में प्रकाशित हुआ। मासूमा, सैदाई, जंगली कबूतर, दिल की दुनिया, अजीब आदमी और बांदी उनके अन्य उपन्यास हैं। कलियाँ, चोटें, एक रात, छुई-मुई, दो हाथ दोज़ख़ी, शैतान आदि कहानी-संग्रह हैं। हिन्दी में कुँवारी व अन्य कई कहानी-संग्रह तथा अंग्रेजी में उनकी कहानियों के तीन संग्रह प्रकाशित जिनमें काली काफ़ी मशहूर हुआ। कई फि़ल्में लिखीं और जुनून में एक रोल भी किया। 1943 में उनकी पहली फि़ल्म छेड़-छाड़ थी। कुल 13 फि़ल्मों से वे जुड़ी रहीं। उनकी आखि़री फि़ल्म गर्म हवा (1973) को कई अवार्ड मिले।

    साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा उन्हें 'इक़बाल सम्मान’, 'मख़दूम अवार्ड’ और 'नेहरू अवार्ड’ भी मिले। उर्दू दुनिया में 'इस्मत आपा’ के नाम से विख्यात इस लेखिका का निधन 24 अक्टूबर, 1991 को हुआ। उनकी वसीयत के अनुसार मुम्बई के चन्दनबाड़ी में उन्हें अग्नि को समर्पित किया गया।

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